Uttar Pradesh

Ballia News: सबसे अलग थी बलिया की स्वराज सरकार, 14 दिन में रचा इतिहास! नर्तकी, डकैत की ये कहानी देगी चौंका

बलिया: बलिया की धरती न सिर्फ बगावत के लिए मशहूर रही है, बल्कि यहां का इतिहास हमें बताता है कि असली ‘रामराज्य’ कैसे चलता है. 1942 में जब पूरा देश आजादी की लड़ाई में जल रहा था, तब बलिया के स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजी हुकूमत को धता बताते हुए रेवती नगर पंचायत में अपनी खुद की ‘स्वराज सरकार’ बना ली थी. यह सरकार सिर्फ दिखावे की नहीं थी, बल्कि उसने ऐसे फैसले भी लिए जो आज की सरकारों के लिए उदाहरण बन सकते हैं.

इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय के मुताबिक, बलिया- छपरा रेलखंड पर आजादी के मतवालों ने रेल पटरी उखाड़कर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी थी. इसी दौर में एक नर्तकी, जो छपरा में अपनी प्रस्तुति के बाद बलिया लौट रही थी, डकैतों के गिरोह ने उसे रास्ते में लूट लिया. न सिर्फ उसके लाखों के जेवरात ले लिए गए, बल्कि उसके साथ चल रहे साजिंदों के वाद्य यंत्र और नगदी भी छीन ली गई.

स्वराज सरकार ने सुलझा दी थी डकैती की गुत्थीइसके बाद जो हुआ, वो आज के समय में कल्पना से बाहर है. नर्तकी और उसके साथी जब रेवती की स्वराज सरकार के स्वयंसेवकों के पास पहुंचे, तो न सिर्फ उन्हें सम्मानजनक ठहरने की जगह दी गई, बल्कि उनकी पूरी बात ध्यान से सुनी गई. महज दो दिन में ही इस सरकार ने डकैती की गुत्थी सुलझा दी और सारे आभूषण, 42,000 रुपए नकद, तबला- सारंगी तक बरामद करवा कर वापस लौटा दिए.

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डकैतों को दिलवाई गई अनशासन की शिक्षाइतना ही नहीं, जिन चोरों और डकैतों को पकड़ा गया, उन्हें कोर्ट- कचहरी में घसीटा नहीं गया, बल्कि उन्हें इंसानियत और अनुशासन की शिक्षा दी गई. तीन दिन तक उन्हें रेवती में ही रखा गया और अंत में एक शपथ दिलवाकर छोड़ दिया गया कि वे भविष्य में ऐसा कोई अपराध नहीं करेंगे. और हैरानी की बात यह है कि उन डकैतों ने वाकई दोबारा कभी अपराध नहीं किया.

इस कहानी को साझा करने का मकसद सिर्फ बीते दिनों की तारीफ करना नहीं है, बल्कि यह याद दिलाना है कि जब देश आजाद भी नहीं था, तब भी लोगों के मन में कानून, नैतिकता और अनुशासन के प्रति कितना गहरा सम्मान था. तब अपराधी भी ‘स्वराज सरकार’ की नैतिकता और फैसलों को मानते थे. आज जब हम हर मंच पर ‘रामराज्य’ की बात करते हैं, तो क्या हमने वैसा आदर्श शासन कभी देखा है?

आज जरूरत है उस मूल भावना को फिर से जगाने की, जो हमें एक आदर्श समाज की ओर ले जा सके. आजादी की सालगिरह पर सिर्फ झंडा फहराने से कुछ नहीं होगा, बल्कि अगर हम अपने भीतर फैली विकृतियों को दूर करें, तभी अपने पूर्वजों की कुर्बानी का सही सम्मान कर पाएंगे.

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