बनारस की अनोखी होली: एक अनुभव जो दुनिया भर को आकर्षित करता है
बनारस, जिसे मस्ती, भक्ति और अल्हड़पन का संगम कहा जाता है, यहां की होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक अनोखा अनुभव बन जाती है. घाटों से लेकर गलियों तक, मंदिरों से लेकर महाश्मशान तक हर जगह रंग, भक्ति और उत्साह का अलग ही रंग देखने को मिलता है. देश ही नहीं, दुनिया भर से लोग काशी की इस अनोखी होली का हिस्सा बनने आते हैं. आखिर क्या है बनारस की होली में ऐसा खास, जो इसे पूरी दुनिया से अलग बनाता है? आइए जानते हैं…
बनारस में महाश्मशान घाट पर जलती चिताओं के बीच भी भस्म से अनोखी होली खेली जाती है. इस होली में अघोरी, तांत्रिक, किन्नर और काशी वासी शामिल होते है. मसाने की होली का आयोजन सिर्फ और सिर्फ काशी में ही होता है. रंगभरी एकादशी के दिन यह उत्सव मनाया जाता है, जिसमें कई क्विंटल भस्म उड़ाए जाते है. बनारस में कपड़ा फाड़ होली भी होती है. वाराणसी के हृदय स्थल गोदौलिया चौराहे पर इसका आयोजन होता है. होली के इस अनोखे रंग में काशी वासी पूरी तरह रम जाते है. इसमें शामिल होने वालों को पहले रंग लगाया जाता है, फिर उसका कपड़ा फाड़ा जाता है. काशी में भक्त और भगवान की होली भी होती है. रंगभरी एकादशी के दिन काशी के पुराधिपति बाबा विश्वनाथ और माता गौरा भक्तों के साथ जमकर होली खेलते हैं. यह परम्परा सदियों पुरानी है. काशी में इस दिन से ही रंगोत्सव का आगाज हो जाता है. इस दिन पूरी काशी बाबा विश्वनाथ के साथ होली खेलने के लिए गलियों में जुटती है. लाखों श्रद्धालु देश के अलग-अलग कोनों से भी इस होली में शामिल होने के लिए यहां आते हैं.
काशी के मशहूर घाटों पर भी होली का अलग रंग देखने को मिलता है. यहां युवाओं की टोली अलग-अलग अंदाज में होली खेलते नजर आते हैं. ढोलक, मंजीरा और डमरू के डम-डम की आवाज के बीच ये होली खेली जाती है. होली के दिन ऐसी कई टोलियां अजीबो-गरीब ढंग से होली के रंग में रंगे दिखते हैं. वाराणसी में कीचड़ वाली होली भी होती है. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में स्टूडेंट्स की ओर से इसका आयोजन होता है. इस होली में रंग गुलाल के साथ युवा मिट्टी के कीचड़ से होली खेलते है. बनारस की होली का अनोखापन और उत्साह दुनिया भर के लोगों को आकर्षित करता है, जो इसे एक अनोखा अनुभव बनाता है.

