Last Updated:July 12, 2025, 11:31 ISTबांसुरी के बारे में हम सभी जानते हैं, और जानें भी क्यों न — यह श्रीकृष्ण का प्रिय वाद्य यंत्र जो ठहरा. लेकिन हम में से बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि बांस का एक साधारण टुकड़ा आखिर किस तरह से स्वर और सुरों से भरपूर एक बांसुरी का रूप लेता है. पीलीभीत शहर में बांसुरी कारीगरी मुस्लिम परिवारों का परंपरागत पेशा रहा है, जहां पीढ़ियों से यह कला जीवित है. बांसुरी बनाने की यह प्रक्रिया कई जटिल और मेहनत भरे चरणों में पूरी होती है, जिसमें कारीगरों की सूझ-बूझ और कला दोनों झलकती है. पीलीभीत में बांसुरी कारीगर बांसुरी बनाने के लिए कच्चा माल असम के सिलचर शहर से मंगाते हैं. बांसुरी बनाने के लिए खास किस्म के बांसों को चुना जाता है. प्रमुख तौर पर निब्बा या डोलू बांस का इस्तेमाल किया जाता है. वर्षों पहले तक यह कच्चा माल ट्रेन के जरिए पीलीभीत पहुंचता था, लेकिन अब बांसुरी कारीगर इसे सड़क मार्ग से मंगवाते हैं. कच्चे माल के आने के बाद अनुभवी कारीगर द्वारा बांसुरी बनाए जाने के लिए माल को छांटा जाता है. इसके बाद कारीगर बांसुरी को सटीक जगह से काटते हैं. यह एक अहम चरण होता है, क्योंकि इसी स्थान से दी जाने वाली हवा से बांसुरी में आवाज उत्पन्न होती है. बांस की कटिंग के बाद इन्हें महिला कारीगरों के पास भेजा जाता है. ये महिलाएं बांस के टुकड़ों में लोहे की गर्म सलाखों से सुराख करती हैं. इन्हीं सुराखों के जरिए बांसुरी बजाने वाला कलाकार सुरों को बदलता है. खास बात यह है कि बांसुरी में सुर देने का काम महिलाओं की ओर से ही किया जाता है. एक बार जब महिलाओं द्वारा बांसुरी को स्वर दे दिए जाते हैं, तब यह बांसुरी फिर से पुरुष कारीगरों के हाथ में आ जाती है. इसके बाद पुरुष कारीगर बांसुरी में डाट लगाने का काम करते हैं. इसी डाट के जरिए बांसुरी में जाने वाली हवा नियंत्रित होती है. सभी चरणों से गुजरने के बाद, सबसे अंत में बांसुरी को सजाने, रंगने और फिनिशिंग के लिए भेजा जाता है. बांसुरी कारीगरों की कड़ी मेहनत के बाद बांस का एक टुकड़ा बांसुरी का रूप ले लेता है, जिसे व्यापारी पूरे देश भर में सप्लाई करते हैं. आपको बता दें कि पीलीभीत में बांसुरी का कारोबार सदियों पुराना है. जानकारों की मानें तो सूफी संत सुभान शाह मियां द्वारा पीलीभीत में बांसुरी कारीगरों को बसाया गया था, जिसके बाद यह हुनर शहर भर के तमाम लोगों तक पहुंचा. लेकिन बदलते समय के साथ अधिकांश लोगों ने अपने परंपरागत काम से मुंह मोड़ लिया है. वर्तमान में लगभग ढाई सौ परिवार ही इस काम में जुटे हुए हैं.homeuttar-pradeshकृष्ण की प्रिय बांसुरी आखिर कैसे बनती है? जानें कारीगरों की अनसुनी कहानी
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