Uttar Pradesh

कॉरिडोर बना टेंशन का कारण! वृंदावन में 50% लोगों के पास नहीं है घर की रजिस्ट्री, अब मुआवजे का संकट

मथुरा: बांके बिहारी मंदिर के कॉरिडोर को लेकर मथुरा के वृंदावन में इस वक्त सिर्फ एक ही चर्चा है, “हम कहां जाएंगे?” मंदिर के आसपास के मोहल्लों में रहने वाले लोग दिन-रात इसी चिंता में डूबे हैं कि कहीं सरकार उन्हें उनके पुश्तैनी घरों से बेदखल न कर दे. बात सिर्फ भावनाओं की नहीं है, बात दस्तावेजों की भी है, क्योंकि कई परिवारों के पास अपने घरों की रजिस्ट्री के कागज तक नहीं हैं.कॉरिडोर के नाम पर मंडरा रहा संकट
वृंदावन के राधा मोहन घेरा, बिहारीपुरा और आसपास के इलाकों में कॉरिडोर को लेकर माहौल बेहद तनावपूर्ण बना हुआ है. मंदिर की भव्यता और दर्शनार्थियों की भीड़ को मैनेज करने के नाम पर सरकार इस क्षेत्र में कॉरिडोर बना रही है. लेकिन स्थानीय लोगों को लगता है कि इस विकास की कीमत उन्हें अपना घर गंवाकर चुकानी पड़ सकती है.

पैतृक संपत्ति, लेकिन कोई रजिस्ट्री नहीं!राधा मोहन घेरा के रहने वाले मुकेश अग्रवाल ने लोकल18 से बातचीत में बताया कि इस इलाके के अधिकतर लोग कई पीढ़ियों से यहीं रह रहे हैं. कोई चार पीढ़ी से, तो कोई छह पीढ़ी से इस मोहल्ले का हिस्सा है. लेकिन दिक्कत ये है कि करीब 50 प्रतिशत लोगों के पास रजिस्ट्री या वैध कागजात नहीं हैं. संपत्ति पैतृक है, लेकिन आधिकारिक रिकॉर्ड में कुछ दर्ज नहीं है.

“अयोध्या जैसी कहानी ना बन जाए…”
मुकेश अग्रवाल कहते हैं कि लोग डरे हुए हैं कि कहीं वृंदावन में अयोध्या जैसा हाल न हो जाए. वहां राम मंदिर निर्माण के समय आसपास के लोगों को हटाया गया, कईयों को मुआवजा मिला तो कुछ को कुछ भी नहीं मिला. अब बांके बिहारी मंदिर के चारों ओर बनने वाला कॉरिडोर लोगों के लिए चिंता का कारण बन गया है. सबसे बड़ा डर यही है कि जिनके पास कागज नहीं हैं, उन्हें सरकार मुआवजा नहीं देगी.

वृंदावन में डर का माहौलयह विडंबना ही है कि राधे-कृष्ण की भक्ति में डूबा रहने वाला वृंदावन अब सरकारी योजनाओं के डर से सहमा हुआ है. लोग कहते हैं कि पहले मंदिर की भक्ति पर चर्चा होती थी, अब हर गली, हर नुक्कड़ पर बस “कॉरिडोर” का जिक्र है. हर कोई एक-दूसरे से यही पूछ रहा है कि तुम्हारे पास रजिस्ट्री है? अगर नहीं है, तो क्या होगा?

स्थानीय प्रशासन से की ये अपीलस्थानीय लोग चाहते हैं कि प्रशासन इस मसले को मानवीय दृष्टिकोण से देखे. जिनके पास दस्तावेज नहीं हैं, लेकिन वे वर्षों से वहां रह रहे हैं, उन्हें भी संरक्षण और मुआवजे का अधिकार मिले. लोगों ने सरकार से अपील की है कि कॉरिडोर का निर्माण जरूर हो, लेकिन निवासियों की पीढ़ियों की मेहनत और इतिहास को मिटाकर नहीं.

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