Why There Is A Need Of Mental Health Care For Survivors Of Human Trafficking: हर साल 10 अक्टूबर को वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे मनाया जाता है जिसका मक्सद मानसिक स्वास्थ को लेकर लोगों को जागरूक करना और सामाजिक कलंक के खिलाफ लोगों को शिक्षित करना है. इसकी शुरुआत साल 1992 में हुई थी. दुनिया में काफी बड़ी संख्या में लोग डिप्रेशन, स्ट्रेस या किसी और तरह का मेंटल टैबू झेलते हैं. वो लोग भी काफी ज्यादा टेंशन महसूस करते हैं जो मानव तस्करी के शिकार हुए हैं और फिर रेस्क्यू होने के बाद सामाजिक दंश झेलते हैं. आज हम सूपिया खातुन और फिरोजा खातुन के बारे में बताएंगे जो ह्यूमन ट्रैफिकिंग से तो आजाद हो गईं, लेकिन उनके अपने करीबियों ने जिंदगी मुश्किल कर दी.
सर्वाइवर्स ने सुनाई आपबीती
सूपिया खाने ने बताया, “इस बात को 9 साल बीत चुके हैं, लेकिन मैं उस रात को कभी नहीं भूल पाउंगी, जब हमारे पड़ोसियों ने हमारा घर जला दिया था क्योंकि मेरे पिता ने उन ऊंची आवाजों के आगे झुकने से इनकार कर दिया था, जो मांग कर रही थीं, ‘फिरोजा अब इस गांव में नहीं रह सकती, वह हमारे बच्चों को बिगाड़ देगी.’ मेरा अपराध बस इतना था कि 12 साल की उम्र में मेरी तस्करी की गई थी. मैंने अपने घर से एक महीने दूर रहकर डरावना वक्त देखा, वैसा ही सदमा मैंने बाद में उन्हीं लोगों के बीच महसूस किया जिनके आसपास रहकर मैं बड़ी हुई थी. लोगों के दुर्व्यवहार के आघात ने मुझे उदास और भ्रमित कर दिया. मैं किसी से बात नहीं करना चाहती था. तब मुझे ये मालूम नहीं था कि मुझे प्रोफेशनल हेल्प की ज़रूरत थी. काउंसलर तक पहुंचने में मुझे तकरीबन तीन साल लग गए.”
फिरोजा खातून के मुताबिक, ‘सूपिया ने अपनी मर्जी से घर छोड़ा था, लेकिन वो कुछ खास नहीं कर पाई और वो वापस लौट गई.’ पर ये कलंक और सदमा लग चुका था कि रेस्क्यू होने के बाद मैंने एक रात जेल में खतरनाक अपराधियों के साथ बिताई (पुलिस स्टेशन में कोई और जगह नहीं थी जहां मैं ठहर सकती थी). मेरे दिमाग में सदमे और शर्म का अहसास था, जिसे मैं किसी के शेयर नहीं कर सकती थी, बस खुद के मन में रख सकती थी. आज इस बात को 13 साल हो चुके हैं मैं शादीशुदा हूं, लेकिन उस घटना की वजह से मुझे आज भी डिप्रेशन में हूं और मैंने किसी काउंसलर का मुंह नहीं देखा.
आगे की जिंदगी हो जाती है मुश्किलइन दोनों महिलाओं ने बताया, ‘ये हमारी कहानियां हैं, इसमें कुछ भी अनोखा नहीं है क्योंकि हमारे इस विशाल देश में हर उस पुरुष, महिला और बच्चे के पास, जो कभी भी तस्करी का शिकार हुआ है, शायद बताने के लिए इन्हीं कहानियों का कोई न कोई संस्करण है. पूरी की जाने वाली सभी अंतहीन प्रक्रियाओं में, पहले पुलिस स्टेशन में और फिर मेडिकल जांच के लिए अस्पताल में, सबसे बड़ी कमी एक मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल की होती है – एक ऐसा व्यक्ति जो पीड़ित को उसके सदमे से निकलने में मदद कर सकता है. इसके माध्यम से और उन्हें उस सामाजिक कलंक के लिए भी तैयार करें जो उनकी बाकी बची हुई जिंदगी के लिए उनके वजूद को खतरे में डाल देगा.’
मेंटल काउंसलिंग की क्यों है जरूरत?’इतने सालों तक इस फील्ड के लोगों के साथ काम करते हुए हम इस बात से वाकिफ हुए कि हैं ह्यूमन ट्रैफिकिंग के सर्वाइवर्स को रेस्क्यू करने के बाद रिहैबिलिटेशन प्रॉसेस के दौरान मेंटस हेल्थकेयर की काफी कमी है.पुलिस अधिकारियों द्वारा बचाव, शेल्टर होम्स में ट्रांसफर और फिर अपनी ही कम्यूनिटी में पुनर्वास के बीच का गैप काफी बड़ा है. हीलींग प्रॉसेस के दौरान भरोसा और सपोर्ट बेहद जरूरी है, जो हमारे आसपास नजर नहीं आता. मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल की कमी के कारण हम उस मौकों से महरूम रह जाता है जिसमें उस शख्स से बात करें जो हमारे दुखों के असल कारणों का पता लगाने में मदद कर सकता है.एक तो हमें काउंसल चाहिए जिसकी भारी कम है इसके बाद प्राइमरी हेल्थ सेंटर की जरूरत है. समुदाय के लोंगो को एक साथ आना चाहिए जिससे ह्यूमन ट्रैफिकिंग के सर्वाइवर्स को इज्जत की जिंदगी हासिल हो जाए. मेंटल हेल्थ केयर वो अधिकार है जो सर्वाइवर्स को मिलना ही चाहिए, जिससे सदमें का असर पूरी जिंदगी न रहे.’
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