Yuvraj Mehta Case: नोएडा के सेक्टर-150 में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार समेत पानी में डूबने से हुई मौत ने न केवल एक परिवार को उजाड़ दिया, बल्कि उत्तर प्रदेश के आपदा प्रबंधन और प्रशासनिक मुस्तैदी की भी पोल खोलकर रख दी है. जब युवराज जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा था, तब सिस्टम ‘खाली हाथ’ खड़ा था. अब अपनी गर्दन फंसती देख जिम्मेदार अधिकारी अपनी लापरवाही पर पर्दा डालने की कोशिश में जुट गए हैं. वहीं दूसरी ओर विरोधाभासी बयानों और अधूरी रिपोर्टों ने जांच की रफ्तार को सुस्त कर दिया है.
अधूरी रिपोर्ट और विरोधाभासी बयानों ने उलझाई जांचयुवराज की जान बचाने में नाकाम रहे जिम्मेदार अब अपने गुनाहों को छिपाने की जुगत में लगे हैं. एनबीटी की खबर के मुताबिक, युवराज मामले की जांच कर रही विशेष जांच टीम (SIT) को जो रिपोर्ट सौंपी गई है, वह अधूरी और विरोधाभासी है. अधिकारियों के बयान और जमीनी हकीकत मेल नहीं खा रहे हैं. अपनी साख बचाने के लिए विभाग ‘गोल-मोल’ जवाब दे रहे हैं, जिसके कारण SIT शासन को सौंपी जाने वाली अपनी फाइनल रिपोर्ट वक्त पर नहीं सौंप सकी है.
खाली हाथ थे रेस्क्यू कर्मी, अब खरीदे जाएंगे 29,000 इमरजेंसी किटहादसे के वक्त सबसे बड़ी विफलता उपकरणों का ना होना था. दरअसल, जिस वक्त युवराज की कार बेसमेंट के पानी में डूबी थी, उस समय रेस्क्यू टीम के पास न तो गोताखोर थे और न ही जरूरी जीवन रक्षक उपकरण यानी ‘इमरजेंसी किट’. इस नाकामी से सबक लेते हुए अब यूपी राज्य आपदा प्रबंधन विभाग 29,772 इमरजेंसी रिस्पॉन्डर किट खरीदने का फैसला किया है. इन किटों में प्राथमिक चिकित्सा सामग्री, सूखा भोजन, टॉर्च, रस्सी, दस्ताने, हेलमेट और अन्य सुरक्षा उपकरण होंगे.
साथ ही, कर्मचारियों को विशेष ट्रेनिंग मॉड्यूल के जरिए प्रशिक्षित किया जाएगा. यहां सबसे हैरानी की बात यह है कि 16 जनवरी की रात हुए हादसे के बाद, विभाग ने 22 जनवरी को टेंडर जारी किया. यह इस बात का सबूत है कि हादसे के वक्त प्रशासन पूरी तरह से निहत्था था. यदि ये उपकरण पहले से मौजूद होते और स्टाफ प्रशिक्षित होता, तो घंटों चले रेस्क्यू ऑपरेशन का नतीजा कुछ और हो सकता था.
बिल्डर की बढ़ी मुश्किलें, बैंक खाते हो सकते हैं फ्रीजजांच में यह बात भी सामने आई है कि हादसे वाली जगह पर पहले से ही खतरे के संकेत मौजूद थे. फाइलों में दर्ज है कि साइट पर जलभराव, खुले गड्ढे और सुरक्षा इंतजामों की कमी थी, लेकिन विभागों ने इन पर ध्यान देने के बजाय केवल खानापूर्ति की. अब पुलिस ने इस मामले में ‘लोटस ग्रीन’ बिल्डर के मालिक निर्मल सिंह के खिलाफ केस दर्ज किया है, जो फिलहाल फरार चल रहे हैं. इतना ही नहीं, पुलिस अब बिल्डर कंपनी के बैंक खातों को फ्रीज करने की तैयारी में है.
लोटस ग्रीन बिल्डर के मालिक निर्मल सिंह के खिलाफ केस दर्ज है और कोर्ट से गैर-जमानती वारंट भी जारी हो चुका है, लेकिन आठ दिन बीत जाने के बाद भी आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर है. जांच में यह सवाल भी उठा है कि खतरनाक स्थिति के बावजूद साइट पर बेसमेंट के गड्ढे में पानी भरने की जानकारी अथॉरिटी को कब से थी और उस पर संज्ञान क्यों नहीं लिया गया.
चश्मदीद मुनेंद्र की सुरक्षा पर खतरा, CM योगी से लगाई गुहारइस पूरे घटनाक्रम के सबसे अहम चश्मदीद गवाह मुनेंद्र ने शनिवार को SIT के सामने अपने बयान दर्ज कराए. मुनेंद्र वही व्यक्ति है जिसने अपनी जान जोखिम में डालकर युवराज को बचाने की कोशिश की थी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बयान दर्ज कराने के बाद मुनेंद्र ने अपनी जान को खतरा बताते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सुरक्षा की मांग की है.
SIT के वो 4 तीखे सवाल जिनका जवाब मिलना बाकी है:1. मुनेंद्र घटना स्थल पर क्यों मौजूद थे और उनकी डिलीवरी लोकेशन क्या थी?2. उन्होंने युवराज को बचाने के लिए कितनी देर तक प्रयास किया?3. क्या उनके पास सुरक्षा के लिए कोई उपकरण था?4. क्या युवक के जीवित रहने की स्थिति में उसे बचाने का कोई और तरीका था?
SIT की रिपोर्ट में तय होगी जिम्मेदारीSIT की जांच अब निर्णायक मोड़ पर है. 27 या 28 जनवरी को यह रिपोर्ट शासन को सौंपी जा सकती है. रिपोर्ट में उन अधिकारियों के नाम शामिल किए जाने की प्रबल संभावना है जिनकी लापरवाही या चूक से यह हादसा हुआ. सूत्रों की मानें तो अथॉरिटी की ओर से गोल-मोल जवाब दिए गए हैं, जिसके चलते SIT ने दोबारा लिखित जानकारी मांगी है.

