Uttar Pradesh

UP News: 42 साल बाद इंसाफ! 100 साल की उम्र में धनी राम हत्या मामले से बरी, इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली आजादी

Last Updated:February 05, 2026, 08:51 ISTUP News: करीब चार दशकों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार 100 वर्ष की उम्र में धनी राम को इंसाफ मिला. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले महीने हमीरपुर निवासी धनी राम को 1982 के एक हत्या मामले में 1984 में मिली सजा से बरी कर दिया. यह मामला जमीन के विवाद से जुड़ा था. धनी राम को निचली अदालत ने हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई थी. न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने 21 जनवरी को सुनाए गए 23 पन्नों के फैसले में अभियोजन पक्ष के मामले में गंभीर खामियां गिनाईं. अदालत ने कहा कि कथित दो प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही भरोसेमंद नहीं है, एफआईआर में जरूरी तथ्यों का अभाव हैइलाहाबाद हाईकोर्टप्रयागराज: न्याय जब समय पर न मिले तो उसका दर्द पीढ़ियों तक महसूस होता है. कभी-कभी अदालतों के लंबे गलियारों में फैसले इस कदर देर से पहुंचते है कि इंसाफ खुद अपनी प्रासंगिकता पर सवाल खड़ा कर देता है. ऐसे ही एक मामले की कहानी आज हम आपको बताने जा रहे है. जहां एक बुज़ुर्ग ने अपनी पूरी उम्र न्याय के इंतजार में गुजार दी. जमीन के विवाद से उपजे एक हत्या मामले में दोषी ठहराया गया व्यक्ति 42 वर्षों तक फैसले की अंतिम मोहर का इंतजार करता रहा. जीवन के सौवें पड़ाव पर पहुंचकर जब अदालत ने उसकी बेगुनाही मानी तो यह फैसला सिर्फ एक व्यक्ति की रिहाई नहीं, बल्कि न्यायिक देरी और मानवीय संवेदनाओं पर भी गहरी टिप्पणी बन गया.

करीब चार दशकों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार 100 वर्ष की उम्र में धनी राम को इंसाफ मिला. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले महीने हमीरपुर निवासी धनी राम को 1982 के एक हत्या मामले में 1984 में मिली सजा से बरी कर दिया. यह मामला जमीन के विवाद से जुड़ा था. धनी राम को निचली अदालत ने हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई थी, हालांकि उसी वर्ष उन्हें जमानत मिल गई थी. इसके बाद वह 42 साल तक अपने मामले के अंतिम फैसले का इंतजार करते रहे, क्योंकि उनकी अपील वर्षों तक अदालत में लंबित रही.

न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने 21 जनवरी को सुनाए गए 23 पन्नों के फैसले में अभियोजन पक्ष के मामले में गंभीर खामियां गिनाईं. अदालत ने कहा कि कथित दो प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही भरोसेमंद नहीं है, एफआईआर में जरूरी तथ्यों का अभाव है और पूरी कहानी में कई स्वाभाविक असंगतियां हैं. अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि मुख्य आरोपी मैकू, जिस पर गोली चलाने का आरोप था, 1982 से फरार है. ऐसे में अभियोजन यह साबित करने में असफल रहा कि धनी राम और सह-आरोपी सत्ती दीन का अपराध संदेह से परे सिद्ध होता है.

फैसले में अदालत ने बेहद मानवीय टिप्पणी करते हुए कहा- “जब कोई व्यक्ति अपने जीवन की सांध्य अवस्था में अदालत के सामने खड़ा हो तब दशकों की प्रक्रियागत देरी के बाद दंड पर जोर देना न्याय को उसके मूल उद्देश्य से अलग एक औपचारिक रस्म बना सकता है.” पीठ ने यह भी कहा कि इतने वर्षों तक चली मानसिक पीड़ा, अनिश्चितता और सामाजिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने धनी राम और सह-आरोपी सत्ती दीन को दोषमुक्त कर दिया. यह फैसला न केवल एक व्यक्ति की आजादी की कहानी है, बल्कि न्याय प्रणाली में देरी के मानवीय पक्ष को भी उजागर करता है.About the AuthorManish Raiकाशी के बगल चंदौली से ताल्लुक रखते है. बिजेनस, सेहत, स्पोर्टस, राजनीति, लाइफस्टाइल और ट्रैवल से जुड़ी खबरें पढ़ना पसंद है. मीडिया में करियर की शुरुआत ईटीवी भारत हैदराबाद से हुई. अभी लोकल18 यूपी के कॉर्डिनेटर की…और पढ़ेंLocation :Allahabad,Uttar PradeshFirst Published :February 05, 2026, 08:51 ISThomeuttar-pradesh100 साल की उम्र में धनी राम मिला हाईकोर्ट से न्याय, 42 साल की चली कानूनी लड़ाई

Source link

You Missed

Scroll to Top