बलिया जनपद में एक अनोखी परंपरा है, जो सदियों से चली आ रही है। यह परंपरा होली के पहले महीने वसंत पंचमी से शुरू हो जाती है, जब फगुआ गाने की परंपरा पूरे गांव में एक उत्साह का माहौल बनाती है।
इस परंपरा के अनुसार, पूरा गांव ढोल-मंजीरे और डफ आदि पारंपरिक वाद्ययंत्र के साथ एकत्र होता है और फगुआ की आवाज गूंजने लगती है। यह टोली हर घर जाती है, अबीर लेती है और फगुआ का गायन करती है। यह परंपरा एक हफ्ते तक चलती है, जब तक कि फगुआ की समाप्ति न हो जाए।
इस परंपरा में मुस्लिम भाई भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, जो एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करते हैं। यहां कोई बाहर से कलाकार नहीं आते, बल्कि पूरा गांव ही कलाकार बन जाता है। इसका कोई स्पेशल क्लास नहीं, बल्कि यह गुण पीढ़ी दर पीढ़ी खुद जेहन में उतर जाती है।
बलिया जनपद के नरही थाना क्षेत्र अंतर्गत चौरा गांव निवासी चन्द्रेश्वर सिंह ने कहा कि, यह परंपरा सदियों से बाप दादा के द्वारा होती आ रही है, जिसे आज भी बरकरार रखा गया है। इसमें बहुत दूर दूर से लोग आते हैं। यही नहीं, सिर्फ होली के लिए जो नौकरी करने विदेश जाते हैं, वो लोग भी होली में फगुआ गाने के लिए गांव में आते हैं।
होली के फगुआ में पारंपरिक गीत गाए जाते हैं, जैसे कि रंगहोली, मनोरवा और नारदी आदि। इसमें हिन्दू और मुस्लिम भी प्रतिभागी बनते हैं, कोई भेदभाव नहीं होता है। यह होली की धुन वसंत पंचमी से ही शुरू हो जाती है।
इस परंपरा के दौरान जरूरत के हिसाब से गाली भी गाया जाता है, लेकिन यह बुरा न मानो होली है। इस दौरान बुजुर्गों में भी जवानी आ जाती है, खासकर होली के दिन जहां सम्मत जलता है, वहां फगुआ गाया जाता है, उसके बाद दिनभर रंग खेला जाता है।
फगुआ की समाप्ति सदा आनंद रहे एहि द्वारे, मोहन खेले होली नामक गीत से होती है। यह परंपरा पूरे गांव को एक साथ जोड़ती है और एक अद्भुत माहौल बनाती है।

