Uttar Pradesh

संघ को कुछ लोग पैरा-मिलिट्री संगठन समझ लेते हैं, मोहन भागवत ने क्यों कहा, आरएसएस जैसा कोई दूसरा नहीं

मेरठ. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शनिवार को कहा कि संघ की तुलना किसी अन्य संगठन से नहीं की जा सकती, क्योंकि संघ जैसा कोई दूसरा है ही नहीं। उन्होंने कहा कि संघ की शाखा और संचलन को देखकर कुछ लोग इसे “पैरा-मिलिट्री संगठन समझ लेते हैं”, जबकि वास्तविकता यह है कि संघ व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला है, जहां व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया को मूर्त रूप दिया जाता है।

उन्होंने कहा, “संघ की स्थापना ऐसे समय में हुई जब देश पराधीन था और समाज अनेक कुरीतियों तथा असमानताओं से ग्रस्त था। केशव बलिराम हेडगेवार के संपर्क उस समय के कई स्वतंत्रता सेनानियों बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, सुभाषचंद्र बोस, विनायक दामोदर सावरकर, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद से थे। उस समय एक प्रमुख चिंता यह थी कि भारत बार-बार पराधीन क्यों होता है।”

भागवत ने कहा कि सभी के विचारों का सार यही था कि समाज अपने ‘स्व’ को भूल गया, जिससे विखंडन बढ़ा, कुरीतियां आईं और असमानताएं गहरी हुईं। इसी चिंतन के आधार पर डॉ. हेडगेवार ने समरस, संगठित और अनुशासित समाज के निर्माण का मार्ग चुना, जिसे संघ के माध्यम से आगे बढ़ाया गया।

उन्होंने कहा, “भारत में रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है। ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ किसी मत-पंथ विशेष से नहीं, बल्कि उस जीवन दृष्टि से है जो सबको जोड़ने, सबके हित में सोचने और समस्त सृष्टि के कल्याण की प्रेरणा देती है।”

भागवत ने कहा कि मत, पंथ और पूजा पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन सांस्कृतिक पहचान एक है। संघ के सौ वर्ष पूरे होने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस दौरान संगठन ने प्रतिबंध झेले, झूठे आरोपों का सामना किया, राजनीतिक विरोध सहा और स्वयंसेवकों ने बलिदान भी दिए, लेकिन दृढ़ संकल्प और असीम इच्छाशक्ति के बल पर संघ आगे बढ़ता रहा।

उन्होंने कहा कि शताब्दी वर्ष में संघ समाज के बीच जाकर अपने कार्यों की जानकारी दे रहा है और समाज की सज्जन शक्ति से राष्ट्र उत्थान में सहयोग का आह्वान कर रहा है। जिज्ञासा समाधान सत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता, मूल्य आधारित शिक्षा और ओटीटी मंचों की सामग्री जैसे विषयों पर प्रश्न पूछे गए।

शिक्षा पर कम बजट के सवाल पर उन्होंने कहा कि बजट बढ़ाना सरकार का काम है, लेकिन शिक्षा सबके लिए सुलभ होनी चाहिए। ‘एक राष्ट्र-एक शिक्षा’ और ‘एक राष्ट्र-एक स्वास्थ्य नीति’ के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि नीतियां बनी हैं, लेकिन क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार कुछ लचीलापन भी जरूरी है और इन्हें लागू करना राज्यों का विषय है।

कार्यक्रम में पद्मश्री भारत भूषण त्यागी, डॉ. सुमेधा आचार्य सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे।

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