Uttar Pradesh

Rock paintings in chitrakoot have direct connection with the lives of tribals



रिपोर्ट:-धीरेंद्र शुक्ला

चित्रकूट: चित्रकूट का विंध्य क्षेत्र इतिहास की दृष्टि से एक विशेष स्थान है, जहां हमें प्रागैतिहासिक काल से आधुनिक काल तक कि निरन्तरता देखने को मिलती है. ये निरन्तरता मानव युग की उत्तपत्ति से लेकर आज विकसित अवस्था में भी वैसे ही आगे बढ़ रही है.

चाहे पाषाणयुग रहा हो, चाहे रामायण युग ,चाहे वैदिक युग, चाहे मुगल काल और फिर चाहे अंग्रेजो का समय रहा, हमेशा मानव अपने पिछले समय से सीखकर आगे अपने परंपरागत मूल्यों को लेकर चलता है.मानव सभ्यता के समृद्ध इतिहास की यात्रा आज भी बदस्तूर जारी है.विकास की इस लम्बी यात्रा को समझने के लिए आपको हमारे पूर्वजों द्वारा हजारो वर्ष पहले बनाये गए शैलचित्रो से समझना होगा.

ये उन दिनों की भाषा है जब मनुष्य विकास के शुरुआती दौर से गुजर रहा था और वो समय पाषाण युग था.हमारे चित्रकूट जनपद में पाषाणयुग के समय के वही प्राचीन शैलचित्र आज भी जीवंत रूप में मानव विकास की समझ और उसकी निरन्तरता को दर्शा रहे हैं. विगत दिनो उड़ीसा राज्य के संबलपुर में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में चित्रकूट के प्राचीन इतिहास से जुड़े रहस्य से पर्दा उठा. चित्रकूट ए कल्चरल हेरिटेज (CACH) के फ़ाउंडर अनुज हनुमत और सदस्य जुगेंद्र मिश्र ने संयुक्त रूप से “चित्रकूट में शैलचित्रों की निरंतरता आदिवासियों के संबंध में” नामक रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया.

आदिवासियों में शैल चित्र की परंपरा

चित्रकूट जनपद के अधिकांशतः आदिवासी आज भी जंगलों में छोटे छोटे कबीलों या समूहों में रहते हैं तथा, मुख्य धारा से आंशिक रूप से जुड़े हुए भी हैं, परन्तुं वर्तमान पाश्चात्य सभ्यता का एक भी फर्क इन पर नहीं पड़ा है, ये आज भी अपनी पुरानी संस्कृति को संजोए हुए हैं, जो इन्हें पूर्वजों से परम्परागत रूप में मिली है, यह सभी आदिवासी समूह कुछ दूर के फर्क में आपस में भिन्न भी हैं परन्तुं सांस्कृतिक विविधता एक भी नहीं है.

हालांकि चित्रकूट क्षेत्र में कोल आदिवासी बहु संख्यक मात्रा में है और ये आज भी अपनी पुरानी लोक मान्यताओं, कलाओं तथा सांस्कृतिक विरासत को बचाये हुए हैं. इस क्षेत्र के आदिवासी घने जंगलों में स्थित शैलाश्रयों की पूजा अर्चना भी करते हैं. उनकी मान्यता है की यह स्थान उनके पूर्वजों की देन है तथा वन से प्राप्त होने वाली किसी भी वस्तु या पदार्थ के लिए यहां आकर अनुमति मांगी जाती है तथा उसके बाद जंगल से प्राप्त चीजों का इस्तेमाल किया जाता है.

यह भी मान्यता है कि चरवाहों के जानवर जब भी खो जाते हैं तब वह यहीं आकर प्रार्थना करते हैं जिससे उनके जानवर भटकर वापस अपने गंतव्य स्थान तंक पहुँच जाते हैं, कुछ आदिवासी यहां दीपावली के दिन दीपक जलाकर पूजा अर्चना करते हैं एवं अपने पूर्वजों को धन्यवाद ज्ञापित करते हैं, इन तमाम शैलाश्रयों में कुछ तथ्य ऐसे भी हैं कि जिनपर विश्वास करना भी मुश्किल है, कुछ मूलनिवासी मानते हैं कि इन स्थानों पर बहुत से तांत्रिक आकर अपनी तंत्र विद्या को सिद्ध करते हैं,अतः इन सभी कारणों से शैलाश्रयों में अतिक्रमण नहीं हो पाया.

आम आदमी इन शैलाश्रयों से डरते भी हैं क्योंकि उन्हें इनके बारे में केवल कुप्रचारित किया गया है,वर्तमान में बहुत से आदिवासी समूह अपने घरों में इन शैलचित्रों के अवशेषों को विभिन्न पर्वों में अपने घरों में आजभी बनाते हैं एवं उनकी पूजा करते हैं, साथ ही साथ नए वैवाहिक कार्यक्रमों में इनका मुख्य स्थान होता है, घरों की कच्ची मिट्टी की दीवालों पर गेरुए रंग से छोटे छोटे चित्र बनाने की भी परम्परा आजभी जीवित है तथा साथ ही दीवाली, होली आदि पर्वों में भित्ति चित्र उकेरने की भी परम्परा विद्यमान है.

रामायण के अनुसार मऊ के ऋषियन क्षेत्र से ही वनवास के दौरान भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण और अपनी पत्नी सीता के साथ प्रवेश किये थे.ये महज संयोग नही है कि ऋषियन से सटी पहाड़ियों में कोटरा के पास बने शैलाश्रयों में उकेरे गए चित्रो का जुड़ाव रामायण काल से होता प्रतीत हो रहा है। इन चित्रों में आज भी हजारों वर्ष बाद निरन्तरता नजर आती है ।

आदिवासियों के जीवन मे शैलचित्रों की निरन्तरता एवं महत्व

समूचे देश मे लाखो की संख्या में आज भी आदिवासी जनजाति के लोग निवास करते हैं. उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में आज भी कोल आदिवासी जीवन की मुख्य धारा से अलग रहकर आज भी सँघर्ष की जिंदगी जी रहे हैं और उनके इस कठिन जीवन मे उनका साथ दे रही है एक बहुत महत्वपूर्ण परम्परा जो हजारो वर्ष पहले से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है.

चाहे विवाह हो, सन्तान उत्तपत्ति हो , आपदा हो , दुख हो ,सुख हो, उत्सव हों या फिर कोई मन्नत हो ,हर समय ये परम्परा उनका साथ देती चली आ रही है .ये परम्परा आज भी आदिवासी जीवन और उसकी संस्कृति को सबसे अलग और नवीन बनाये हुये हैं.इस परम्परा की निरन्तरता के कारण आज भी आदिवासी परिवारों के जीवन मे खुशियों के अपने रंग हैं.

जी हां, हम बात कर रहे हैं उन हजारो वर्ष पुराने शैलचित्रों की जो उनके (आदिवासी) पूर्वजो (आदिमानव) द्वारा बनाये गए थे लेकिन आज भी पत्थर की चट्टानों पर बने गेरुआ , लाल और सफेद रंग के इन चित्रों से इनका जीवन प्रभावित होता है.

शैलचित्रों से जुड़ी परम्परा और उनकी निरन्तरता उन स्थानों के आदिवासियों में ज्यादा देखने को मिलती है जहां के शैलाश्रय बेहद समीप हैं या फिर उस परिवार की निकटता अधिक है जो जंगलों में जाता है या जानवर चराने वाला चरवाहा ,जो अपनी किसी भी समस्या को दूर करने के लिए इन चित्रों की सहायता लेता है.जंगलों में बने हजारो वर्ष पुराने शैलचित्रों से आज भी कोल आदिवासियों का जीवन प्रभावित होता है .
ब्रेकिंग न्यूज़ हिंदी में सबसे पहले पढ़ें News18 हिंदी| आज की ताजा खबर, लाइव न्यूज अपडेट, पढ़ें सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट News18 हिंदी|Tags: Chitrakoot News, Uttarpradesh newsFIRST PUBLISHED : February 24, 2023, 19:34 IST



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