रायबरेली के किसान अब सफेद फूलों वाले पौधों की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। अफीम के नाम से जाना जाने वाला यह पौधा अधिकतर दवाइयों के निर्माण में इस्तेमाल होता है। सरकारी लाइसेंस लेकर की जाने वाली इस खेती में कम लागत में सालाना डेढ़ से दो लाख रुपये तक की कमाई संभव है।
रायबरेली के किसान सफेद फूलों वाले पौधों की खेती से मालामाल हो रहे हैं। यह पौधा आम बोलचाल की भाषा में ‘काला सोना’ यानी की अफीम के नाम से भी जाना जाता है। इसका उपयोग कई औषधियों के निर्माण में किया जाता है। ग्रामीण अंचल क्षेत्र में लोगों में आज भी इसको लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं, क्योंकि लोग इसे नशे के तौर पर इस्तेमाल करते थे। परंतु यही काला सोना अब लोगों की कमाई का अच्छा जरिया बन गया है।
रायबरेली जिले के शिवगढ़ थाना क्षेत्र अंतर्गत बेड़ारु गांव के रहने वाले प्रगतिशील किसान जमुना प्रसाद इस काले सोने की खेती बीते कई वर्षों से कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अफीम की खेती के लिए सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता है, क्योंकि इसका प्रयोग अधिकतर दवाइयों के लिए किया जाता है। सरकार से लाइसेंस मिलने के बाद ही आप इसकी खेती कर सकते हैं।
जमुना प्रसाद ने बताया कि इसमें 10 बिस्वा जमीन में 30 से 40 हजार रुपये की लागत आती है। तो वहीं लागत के मुकाबले साल में डेढ़ से दो लाख रुपये तक का आसानी से मुनाफा भी हो जाता है। उन्होंने बताया कि नवंबर माह में इसकी बुवाई होती है और अप्रैल में यह फसल तैयार हो जाती है।
जमुना प्रसाद ने बताया कि अफीम की बुआई करते ही पौधे में 95-115 दिनों में फूल आने लगते हैं। धीरे-धीरे ये फूल झड़ जाते हैं और 15 से 20 दिन में पौधों में डोडे आने लगते हैं। उन्होंने बताया कि वह बीते लगभग 40 वर्षों से इसकी खेती कर रहे हैं और इसे सफलतापूर्वक उगा रहे हैं।
रायबरेली के किसान सफेद फूलों वाले पौधों की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। अफीम के नाम से जाना जाने वाला यह पौधा अधिकतर दवाइयों के निर्माण में इस्तेमाल होता है। सरकारी लाइसेंस लेकर की जाने वाली इस खेती में कम लागत में सालाना डेढ़ से दो लाख रुपये तक की कमाई संभव है।

