पपीते की फसल को तबाह करते हैं ये 4 रोग, जान लें बचाव और उपाय
पपीते की खेती उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में बड़े पैमाने पर की जाती है, जिससे किसानों को अच्छा खासा मुनाफा होता है. कम लागत में अधिक मुनाफा पपीते की खेती से कमाया जा सकता है. लेकिन बदलते मौसम के कारण रोगों का प्रकोप अधिक रहता है. ऐसे में थोड़ी सी लापरवाही होने के कारण पपीता का फल खराब होने लगता है जिस कारण किसानों का लाखों रुपए का नुकसान हो जाता है.
पपीते के पौधे में कई रोग और कीट लग सकते हैं, जिनमें से तना गलन, लीफ कर्ल, डंपिंग ऑफ और लाल मकड़ी जैसी बीमारियां इसे पूरी तरह से बर्बाद कर सकती हैं. ऐसे में किसानों को इस समस्या से निजात के लिए आज हम पपीते में लगने वाले रोग से बचाव के उपाय बताने जा रहे हैं।
पपीते की फसल में तना गलन रोग के कारण पौधे के तने का ऊपरी छिलका पीला होकर गलने लगता है. फिर धीरे-धीरे यह गलन जड़ तक पहुंच जाती है. इस कारण पौधा सूख जाता है, जिससे उत्पादन में कमी आती है. इस रोग से बचाव के लिए किसानों को पपीते के पेड़ के आस पास पानी न जमा हो. सिंचाई के लिए जो पानी डालें उसके निकास की अच्छी व्यवस्था हो. जिन पेड़ों में ये रोग लग गया है उन्हें खेत से निकालकर जला देना चाहिए.
पपीते के पेड़ में एक और रोग देखने को मिल रहा है. वो है लीफ कर्ल रोग. ये एक विषाणु जनित रोग है, जो सफेद मक्खियों से फैलता है. इस रोग के कारण पत्तियां सिकुड़ कर मुड़ जाती हैं और फल सूखने लगते हैं. इस रोग से 70-80 प्रतिशत तक फल का नुकसान हो जाता है. इस रोग से बचने के लिए रोगी पौधों को उखाड़कर खेत से दूर गड्ढे में दबाकर नष्ट कर दें. सफेद मक्खियों के नियंत्रण के लिए डाइमिथोएट 1 मि.ली. का प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए.
कृषि वैज्ञानिक प्रदीप बिसेन ने जानकारी देते हुए बताया कि बदलते मौसम के कारण पपीते में अक्सर रोगों का प्रकोप दिखाई देता है. ऐसे में इस समय मार्च के महीने में लाल मकड़ी पपीते की फसल में लगने वाले प्रमुख कीटों में से एक है. पौधे और फलों पर इसके प्रभाव से फल खुरदुरे और काले रंग के हो जाते हैं. काला धब्बा रोग पपीते में तेजी से फैल रहा है. इसके बचाव के लिए कॉपर ऑक्सी क्लोराइड, मैन्कोजेब या क्लोरोथालोनिल 2 ग्राम/लीटर पानी में घोलकर छिड़काव का उपयोग करके आसानी से इनसे छुटकारा पाया जा सकता है.

