Uttar Pradesh

मरने के बाद जहन्नुम नसीब, गुनहगार पर बरसता है अल्लाह का कहर, जानें इस्लाम में गुनाह-ए-कबीरा क्या होता है?

अलीगढ़: मुस्लिम समाज के लोगों का मानना है कि इस्लाम में इंसान की ज़िंदगी को पाक और बेहतर बनाने के लिए कुछ हदें तय की गई हैं. इन्हीं हदों को तोड़ना गुनाह कहलाता है, लेकिन हर गुनाह एक जैसा नहीं होता. कुछ गुनाह ऐसे हैं, जिन्हें कुरआन और हदीस में बेहद संगीन बताया गया है और इन्हें गुनाह-ए-कबीरा कहा जाता है. ये गुनाह न सिर्फ इंसान की आख़िरत को खतरे में डालते हैं, बल्कि समाज में भी बिगाड़ पैदा करते हैं.

गुनाह-ए-कबीरा क्या हैं, इनमें कौन-कौन से अमल शामिल हैं और इन पर इस्लाम क्या सजा तय करता है. आइए मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना इफराहीम हुसैन से इन्हीं बातों को आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं.

मरने के बाद जहन्नुम नसीब

जानकारी देते हुए मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना इफराहीम हुसैन ने बताया कि मुस्लिम समाज मे कुछ गुनाह ऐसे बताए गए हैं, जिन्हें सबसे बड़ा और गंभीर माना जाता है. इन्हें गुनाह-ए-कबीरा या गुनाह-ए-अज़ीम कहा जाता है. इस्लाम के मुताबिक, ये वो बड़े गुनाह हैं, जिन पर अल्लाह ताला की सख़्त नाराजगी होती है और अगर इंसान बिना तौबा किए दुनिया से चला जाए, तो आखिरत में कड़ी सजा का सामना करना पड़ सकता है. यहां तक कि उस इंसान को सीधा जहन्नुम में डाले जाने की सजा भी दी जा सकती है.

माता-पिता की बात ना मानना क्या गुनाह-ए-कबीरा?

मौलाना ने कहा कि इस्लाम में सबसे बड़ा गुनाह शिर्क को बताया गया है, यानी अल्लाह की जात में किसी को शरीक ठहराना. अल्लाह ही इबादत के काबिल है, उसके सिवा किसी और को खुदा मानना या उसके बराबर समझना गुनाह-ए-कबीरा है. इसके बाद मां-बाप की नाफरमानी करना भी बड़ा गुनाह है.

उन्होंने कहा कि इस्लाम में वालिदैन का दर्जा बहुत ऊंचा रखा गया है और उनकी आज्ञा न मानने को गुनाह-ए-कबीरा में शामिल किया गया है. यतीमों और मिसकीनों का नाहक माल खाना भी गुनाह-ए-कबीरा है. कमजोर और बेसहारा लोगों के हक को मारना इस्लाम में बहुत बड़ा जुर्म माना गया है.

ये गलतियां भी गुनाह-ए-कबीरा

मौलाना ने कहा कि इसी तरह ज़िना करना, नाहक किसी का क़त्ल करना, किसी बेगुनाह की जान लेना भी गुनाह-ए-कबीरा और गुनाह-ए-अज़ीम है, जिन पर दुनिया और आखिरत दोनों में सख़्त अंजाम बताया गया है. इस्लाम में गुनाहों को दो हिस्सों में भी बांटा गया है. एक वो गुनाह जो अल्लाह के हक़ूक़ से जुड़े होते हैं. ऐसे गुनाहों में अगर इंसान सच्चे दिल से तौबा करे, पछतावा करे और आगे वह गुनाह न करने का पक्का इरादा कर ले, तो अल्लाह तआला माफ़ फरमा देता है, क्योंकि वह बहुत बड़ा माफ करने वाला है.

दूसरे वो गुनाह जो बंदों के हक़ूक़ से जुड़े होते हैं. जैसे किसी का हक़ मारना, माल छीनना या ज़ुल्म करना. ऐसे गुनाह सिर्फ तौबा से माफ नहीं होते, बल्कि जब तक हकदार को उसका हक वापस न किया जाए या उससे माफी न मांगी जाए, तब तक माफी पूरी नहीं होती.

जितना बड़ा गुनाह, उतनी बड़ी सजा

उन्होंने कहा कि गुनाहों की सजा हर गुनाह के मुताबिक अलग-अलग है. किसे कितनी सजा मिलेगी, यह आखिरत में अल्लाह ताला तय करेगा. जिसका गुनाह जितना बड़ा होगा, उसका हिसाब भी उतना ही सख्त होगा. अगर कोई इंसान बिना तौबा किए इन गुनाहों के साथ दुनिया से चला गया, तो उसे आखिरत में सख्त सजा का सामना करना पड़ सकता है. यहां तक कि उसे जहन्नुम की सजा भी दी जा सकती है. इसलिए इस्लाम इंसान को हर वक्त गुनाहों से बचने, अल्लाह से डरने और गलती होने पर फौरन तौबा करने की तालीम देता है.Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Local-18 व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.

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