नई दिल्ली (Metro Cities Challenges). मेट्रो शहरों में रहने वाले मिडिल क्लास युवाओं के लिए 2 लाख रुपये प्रति माह की सैलरी किसी सुनहरे सपने से कम नहीं है. यहां तक पहुंचने के लिए लोग सालों तक एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि मुंबई की सड़कों या बेंगलुरु के जाम में फंसा 2 लाख वाला शख्स भी महीने की 25 तारीख आते-आते अपनी जेब टटोलने लगता है? जी हां, सीए नितिन कौशिक ने ऐसा कड़वा सच उजागर किया है, जिसने कॉर्पोरेट जगत के ‘सैलरी हाइप’ की हवा निकाल दी है.
सीए नितिन कौशिक ने सोशल मीडिया पर लिखा- मेट्रो सिटी में यह सैलरी असल में ‘मैथमेटिकल इल्यूजन’ (गणितीय भ्रम) है, जहां पैसा बैंक अकाउंट में दस्तक देने से पहले ही ईएमआई और टैक्स के रास्तों पर निकल जाता है. 24 लाख सालाना कमाने वाला परिवार भी खुद को ‘अमीर’ नहीं, बल्कि सिर्फ ‘सर्वाइवल मोड’ में पा रहा है. CA के एनालिसिस के अनुसार, अब लोग केवल अपनी आजीविका के लिए काम नहीं कर रहे, बल्कि निजी स्कूलों के भारी मुनाफे और बैंक के भारी ब्याज के पहिये घुमाने का ईंधन बन गए हैं.
मेट्रो सिटी का कड़वा सच: ₹2 लाख सैलरी भी क्यों नहीं काफी?
सीए नितिन कौशिक के एनालिसिस ने इंटरनेट पर बहस छेड़ दी है. उन्होंने बताया कि कैसे ₹2 लाख की मासिक आय वाले परिवार भी महीने के अंत में खुद को खाली हाथ पाते हैं. जहां स्कूल की फीस रॉकेट की रफ्तार से बढ़ रही है और मेडिकल खर्चे किसी डरावने सपने जैसे हैं, वहां ₹2 लाख की सैलरी भी महीने के अंत में सिर्फ ‘निल बटे सन्नाटा’ साबित हो रही है. जानिए कैसे ‘हाई-इनकम’ वाला परिवार भी आज मिडिल क्लास के जाल में छटपटा रहा है.
The Indian middle class is being crushed by a MATHEMATICAL impossibilitythat no one wants to admit.
Earning ₹2 lakh a month in a Tier-1 city sounds like a win —until you realize:
Private school fees have surged 160% in a decadeMedical inflation is running at 14% —…
महंगाई का गणित: शिक्षा और स्वास्थ्य की मार
सीए नितिन कौशिक के अनुसार, मध्यम वर्ग की बचत का सबसे बड़ा हिस्सा दो क्षेत्रों में जाता है- बच्चों की पढ़ाई और बीमारी का इलाज.
शिक्षा की लागत: पिछले 10 सालों में निजी स्कूलों की फीस 160% बढ़ गई है. अच्छी शिक्षा के लिए माता-पिता को अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है.
मेडिकल महंगाई: भारत में चिकित्सा महंगाई की दर 14% है, जो एशिया में सबसे अधिक है. बिना बीमा या पर्याप्त बचत के एक छोटा सा ऑपरेशन भी पूरा बजट हिला देता है.
ईएमआई (EMI) का जाल: घर और कार का बोझ
मेट्रो शहरों में रहने का मतलब है ऊंचे किराए या भारी होम लोन.
घर की कीमत: मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में घर खरीदने के लिए आपको अपनी सालाना आय का कई गुना भुगतान करना पड़ता है, जो 20 साल लंबी ईएमआई में बदल जाता है.
लाइफस्टाइल की मजबूरी: ऑफिस जाने के लिए सुरक्षित कार और समाज में बने रहने के लिए अन्य लग्जरी खर्च आय का बड़ा हिस्सा सोख लेते हैं.
टैक्स और अदृश्य खर्चे
2 लाख की सैलरी पर सीधे तौर पर बड़ा इनकम टैक्स कटता है. इसके बाद जो हाथ में आता है, वह महंगे किराए, सोसाइटी मेंटेनेंस, बिजली के भारी बिल और महंगे ईंधन में खत्म हो जाता है. सीए नितिन कौशिक ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर लिखा कि मेट्रो शहरों में रहने वाले उच्च आय वर्ग के लोग असल में ‘रियल एस्टेट और शिक्षा क्षेत्र के लिए कर्ज चुकाने वाले कर्मचारी’ मात्र बनकर रह गए हैं.

