सहारनपुरः जिले में नवदुर्गा का रूप मां शाकुंभरी देवी का विशाल मंदिर स्थापित है और उस मंदिर में कई प्रदेशों से श्रद्धालु दर्शन करने के लिए आते हैं लेकिन क्या आपको पता है मां भगवती का नाम मां शाकंभरी कैसे पड़ा और इसके पीछे का क्या कुछ इतिहास है. अन्न और सब्जियों की अधिष्ठात्री मानी जाने वाली देवी शाकंभरी को समर्पित यह प्राचीन शक्तिपीठ अपनी अनोखी परंपराओं और सदियों पुरानी मान्यताओं के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है. मान्यता है कि भयंकर अकाल के समय देवी ने धरती पर फल, सब्जियों और अनाज की वर्षा की थी, इसी वजह से उन्हें ‘शाकंभरी’ नाम मिला और मंदिर अन्नपूर्णा परंपरा का प्रमुख तीर्थ बन गया.
अकाल में की थी अनाज की वर्षा
शाकंभरी देवी का वह रूप हैं जिन्होंने भयंकर अकाल के समय पृथ्वी पर सब्जियों, फलों और अनाज की वर्षा की थी. इसी वजह से उन्हें अन्नपूर्णा के समान ‘पोषण देने वाली देवी’ कहा जाता है. दुर्गमासुर ने सभी वेद छीन लिए थे, जिससे देवता शक्तिहीन हो गए. तब देवी शाकंभरी ने अवतार लेकर असुर का अंत किया और संसार का कल्याण किया. अन्य मंदिरों की तरह केवल मिठाई नहीं, बल्कि इस मंदिर में सब्जियां और अनाज भी चढ़ाए जाते हैं, जो उनकी विशेष पहचान है. कथाओं के अनुसार, देवी शाकंभरी का यह स्थान सतयुग से सिद्ध पीठ है और यहां भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
सहारनपुर की हैं कुलदेवी
आचार्य सोमप्रकाश शास्त्री ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि सबसे बड़ी बात यह है कि हम लोग यहां पर जहां रहते हैं हमारी कुलदेवी जो है वह शाकंभरी है. और भगवती शाकंभरी पुराणों में भी वर्णित है, हमारे जो 108 सिद्धपीठ होते हैं उन पीठों में भी मां भगवती का वर्णन आता है, दुर्गा सप्तशती में भी वर्णन आता है और स्कंद पुराण आदि में भी भगवती का वर्णन आता है. आपने नाम लिया शाक-अम्भरी भगवती का जो यह नाम है यह दो शब्दों से मिलकर के बना है शाक और अम्भरी जब हम भगवती के स्वरूप को देखते हैं तो माता के पूरे शरीर पर नेत्र बने हुए हैं और दोनों हाथ में माता के शाक और सब्जियां है फल इत्यादि हैं.
शाकंभरी देवी के नाम से हैं कई स्थान
जब यहां पर एक पुरातन समय में कथा के अनुसार अकाल पड़ गया लोग त्राहि-त्राहि होकर के परेशान होने लगे तो मां ने शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में अवतरण लेकर के जो आज की तारीख में राणा जसमोर परिवार के अंतर्गत अधीन मंदिर आता है. वहां पर मां ने उनके कुटुंब में एक रूप से अवतरण लिया और वहां पर अपना स्थान बनाया और उस आकालित स्थान में मां ने अविरल जल अपने नेत्रों से बहाया इसके पश्चात मां ने शाक और सब्जियां भी आशीर्वाद के स्वरूप में प्रदान की और वह अकाल समाप्त हुआ. इसलिए यहां पर मां भगवती को शाक-अम्भरी, शाकंभरी के रूप में मनाया जाता है और कहा भी जाता है हमारे यहां पर बहुत सारे प्रमाण है शाकंभरी यूनिवर्सिटी भी है, शाकंभरी स्टेशन भी है.
उस रूप से यहां पर भगवती का विशेष विराट स्वरूप विराजित है.उत्तर प्रदेश के कोने-कोने से हिमाचल, हरियाणा, उत्तराखंड से लोग यहां पर दर्शन करने आते हैं और मां से मनवांछित फल प्राप्त करके जाते हैं. एक बात आपको विशेष बताता हूं जो व्यक्ति यहां पर आता है और मां की मंदिर के द्वार पर अपने हाथ से मौली व चुन्नी बांध देता है और इच्छा करता है मां कभी भी उसको खाली नहीं रखती.

