Uttar Pradesh

क्या सच में जिन्नात होते हैं और क्या ये हमारी दुनिया में ही रहते हैं.. यहां जानिए हकीकत

जिन्नात का वजूद और उनकी प्रकृति: मुस्लिम धर्मगुरु की बातचीत से जानें सच्चाई

अलीगढ़ में मुस्लिम समाज में जिन्नात के वजूद, उनकी प्रकृति और इस्लाम में उनकी हैसियत को लेकर हमेशा दिलचस्पी और चर्चा बनी रहती है. मुस्लिम समाज के लोगों में अक्सर ये सवाल उठता है कि क्या जिन्नात वाकई होते हैं? क्या वे हमारी ही दुनिया में मौजूद होकर इंसानों को प्रभावित कर सकते हैं? क्या कुरान में जिन्नात के वजूद का साफ़ तौर पर ज़िक्र मिलता है और क्या इस्लाम उनके स्वभाव, उनकी ज़िंदगी और उनकी ताक़त के बारे में कोई स्पष्ट दिशा देता है? इन्हीं तमाम सवालों पर अधिक जानकरी हासिल करने के लिए हमने मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना इफराहीम हुसैन से खास बातचीत की.

मौलाना इफराहीम हुसैन ने बताया कि इस्लाम में जिन्नात का कॉन्सेप्ट बिल्कुल साफ़ है और यह कुरान से साबित है. कुरान में आया है कि अल्लाह तआला ने जिन्नों को बग़ैर धुएं की आग से पैदा किया. एक जगह यह भी ज़िक्र है कि अल्लाह ने इंसान और जिन्नात दोनों को सिर्फ़ अपनी इबादत के लिए पैदा किया है. इससे यह हक़ीक़त साबित होती है कि जिन्नात वजूद रखते हैं और अल्लाह की मख़लूक़ात का हिस्सा हैं.

मौलाना ने कहा कि जिन्नात भी इंसानों की तरह कई तरह के होते हैं. कुछ ऐसे जो अल्लाह पर ईमान रखते हैं और नेक काम करते हैं, वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जो ईमान नहीं लाते और बुराई व नुकसान पहुँचाने वाले काम करते हैं. इनमें से कुछ इंसानों को फायदा पहुंचाते हैं, तो कुछ इंसानों को नुकसान भी दे सकते हैं यानी जैसे इंसानों में अच्छे और बुरे लोग होते हैं, वैसे ही जिन्नात में भी नेक और गुनाहगार दोनों किस्में मौजूद हैं.

मौलाना साहब के मुताबिक़, इस्लाम में महिलाओं के हिजाब और पर्दे का हुक्म भी जिन्नात से संबंधित हिकमतों में से एक है, क्योंकि बाल खुले रखना, बेतरतीब रहना या बिना हिजाब के रहना जिन्नात की नजर को खींच सकता है. शैतानियत, वसवसा और नापाक जगहें जिन्नात की मौजूदगी की वजह बनती हैं, इसलिए औरतों को चादर, हिजाब और पर्दे का हुक्म दिया गया है, ताकि वे हर तरह की बुराई और असर से सुरक्षित रहें.

मौलाना का कहना है कि जहाँ तक इनके रहने की बात है, तो ये हमारे ही आसपास मौजूद रहते हैं. हमें नजर नहीं आते, लेकिन इंसान, फरिश्तों और जिन्न तीनों की मख़लूक़ात अपने अपने तरीके से मौजूद हैं. ये पाक जगहों पर भी रहते हैं और नापाक जगहों पर भी. खास तौर पर गंदी जगहें, लंबे समय से बंद पड़े घर, झाड़-झंखाड़, सुनसान और डरावनी जगहें. इन सब पर जिन्नात का बसना आम बात है. जिन्नात की अपनी ज़िंदगी होती है. इनके निकाह होते हैं, इनकी औलाद होती है, ये पैदा होते हैं और मरते भी हैं.

उन्होंने कहा कि आख़िरत में इनका भी हिसाब-किताब इसी तरह लिया जाएगा जैसे इंसानों से लिया जाएगा. जिन्नात की उम्र बहुत लंबी होती है. कई-कई हजार साल तक भी जी सकते हैं और इनका वजूद बहुत लंबे अरसे से चला आ रहा है. इस्लामी मान्यता में इंसानों को यह भी ताकीद की गई है कि जिन्नात को परेशान न किया जाए, उनका रास्ता न रोका जाए और ऐसी हरकतों से बचा जाए जिनसे वे नुकसान पहुँचाएँ, क्योंकि अगर किसी जगह या माहौल में वे बसते हों और इंसान उन्हें तंग करे, तो वे नुकसान देना शुरू कर सकते हैं.

इस प्रकार, जिन्नात का वजूद और उनकी प्रकृति के बारे में जानने के लिए हमें कुरान और इस्लामी मान्यताओं पर निर्भर रहना चाहिए.

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