अमेठी: सूफी संत मलिक मोहम्मद जायसी ने अमेठी का नाम विश्व स्तर पर पहुंचाया
अमेठी एक ऐसी पहचान रखती है जो कवियों की जन्मस्थली और संतों की तपोभूमि है. यहां ऐसे ऐसे महान शख्सियत ने जन्म लिया जिन्होंने न सिर्फ अमेठी को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई बल्कि आज अमेठी का नाम अमिट छाप के रूप में दर्ज कर दिया है. आज भी उनकी वजह से अमेठी को याद किया जाता है और उनकी स्मृतियां अमेठी में मौजूद हैं जो हर धर्म के लोगों को प्रिय हैं और आज वहां हर धर्म के लोग अपना माथा टेकने आते हैं।
अमेठी के सूफी संत रहे मलिक मोहम्मद जायसी ने अमेठी का नाम विश्व स्तर पर पहुंचा दिया. मलिक मोहम्मद जायसी ने अमेठी में ही अखरावट पद्मावत आखिरी कलाम चित्रलेखा जैसे कई काव्य ग्रंथ और काव्य कृतियों की रचना की. इसके साथ ही उन्हीं की एक रचना पद्मावत पर संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती भी निर्मित की गई, जिसमें अमेठी का नाम शिखर पर पहुंचा.
मलिक मोहम्मद जायसी का इतिहास और उनकी स्मृतियां आज भी अमेठी में मौजूद हैं. अमेठी के जायस में उनका जन्म स्थान और जन्मस्थली मौजूद है, जो चौधराना मोहल्ले में है. इसके साथ ही अमेठी जिले और अमेठी तहसील से करीब 4 किलोमीटर दूर रामनगर में स्थित मलिक मोहम्मद जायसी की समाधि स्थित है, जहां अंतिम छड़ के बाद उन्हें दफनाया गया था।
वरिष्ठ इतिहासकार और कई काव्यकृति और कविताएं लिख चुके राजेंद्र प्रसाद शुक्ला कवि अमरेश बताते हैं कि मलिक मोहम्मद जायसी जी हर धर्म के प्रिय थे. उन्होंने कई रचनाओं के जरिए अमेठी को पहचान दिलाई. उन्होंने कहा कि कतिपय कारणों से उनकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद राज परिवार की तरफ से उन्हें ससम्मान अमेठी के रामनगर में दफनाया गया, जहां आज भी उनका मकबरा मौजूद है. यहां हर धर्म के लोग माथा टेकने आते हैं. उन्होंने कहा कि जायसी जी को किसी से कोई समस्या नहीं थी. हर धर्म के लोगों से वह मिलते थे. इसके साथ ही हर धर्म के लोग उनके प्रिय थे और वह हर धर्म के लोगों के प्रिय थे.
