चित्रकूटः जिनके जीवन में अंधेरा बचपन के कुछ दिन बाद ही उतर आया था, लेकिन उसी अंधेरे को उन्होंने सैकड़ों नेत्रहीन लोगों के लिए उजाले में बदल दिया है. यह कहानी है चित्रकूट के शंकर बाजार निवासी शंकर लाल गुप्ता की जो स्वयं नेत्रहीन हैं, लेकिन आज समाज के लिए दृष्टि बन चुके हैं.
शंकर लाल गुप्ता का जीवन संघर्षों से भरा रहा है.बचपन के शुरुआती दिनों में ही उनकी आंखों की रोशनी चली गई.जिस उम्र में बच्चे दुनिया को रंगों में देखते हैं, उस उम्र में शंकर लाल ने जीवन को अंधेरे में महसूस किया था. हालांकि इस मुश्किल दौर में उनके माता-पिता उनके सबसे बड़े सहारे बने,उन्होंने बेटे को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया, बल्कि साधु-संतों, समाज के प्रेरक लोगों से मिलवाकर यह भरोसा दिलाया कि शारीरिक कमी कभी सफलता की राह में बाधा नहीं बनती है.और इसी संस्कार और आत्मविश्वास के साथ शंकर लाल गुप्ता ने पढ़ाई जारी रखी.
नेत्रहीन के बाद भी नहीं मानी हार
शंकर लाल गुप्ता ने लोकल 18 से बताया कि वह सीमित संसाधनों और तमाम सामाजिक चुनौतियों के बावजूद भी उन्होंने शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है.और कड़ी मेहनत और लगन का नतीजा यह रहा कि मैने सरकारी परीक्षा पास की और दूरसंचार विभाग में नौकरी हासिल की. मेरी पहली पोस्टिंग गाजियाबाद में हुई, जहां मैने वर्षों तक सेवा दी,बाद में वर्ष 1994 में मेरा तबादला चित्रकूट हो गया था. चित्रकूट लौटने के बाद मैने जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया.और महसूस किया कि इस क्षेत्र में दृष्टिबाधित लोगों के लिए न तो कोई ठोस व्यवस्था है और न ही कोई संस्था जो उनके भविष्य के लिए काम कर रही हो.
नेत्रहीन लोगों के लिए खोल दिया स्कूल
ग्रामोदय द्वारा कराए गए एक सर्वे में जब यह सामने आया कि चित्रकूट और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में नेत्रहीन लोग हैं, तभी मैने एक संकल्प लिया.मैने सोचा कि जिस संघर्ष से गुजरकर उन्होंने अपनी पहचान बनाई है, वही रास्ता दूसरों के लिए भी आसान बनाया जाए. इसी सोच के साथ 15 अक्टूबर 1995 को मैने नेत्रहीन लोगों के लिए एक एनजीओ की नींव रखी थी.शुरुआत आसान नहीं थी,संसाधनों की कमी, समाज की शंकाएं और आर्थिक दिक्कतें हर मोड़ पर चुनौतियां खड़ी रहीं, लेकिन मैने शंकर हार नहीं मानी.और समय के साथ समाज का सहयोग मिलने लगा और संस्था आगे बढ़ती गई थी.
नेत्रहीन बालिकाओं की करवाते है शादी
आज उनकी पहल से कक्षा 1 से 12 तक नेत्रहीन बच्चों के लिए शिक्षा की समुचित व्यवस्था है. ब्रेल लिपि के माध्यम से हिंदी और अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई कराई जाती है. कंप्यूटर, संगीत, गणित और अंग्रेजी जैसी आधुनिक शिक्षा भी बच्चों को दी जा रही है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें,यही नहीं, संस्था के माध्यम से कई नेत्रहीन बालिकाओं के विवाह भी कराए गए हैं.आज वे बालिकाएं नौकरी कर रही हैं और एक सम्मानजनक, खुशहाल जीवन जी रही हैं.

