कानपुर को स्मार्ट सिटी का तमगा मिले हुए बरसों हो गए, लेकिन गोविंद नगर की डीबीएस कच्ची बस्ती की हालत इस दावे को आईना दिखा रही है. यहां रहने वाले करीब 27 हजार लोग आज ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं, जहां हर दिन गंदे पानी, बदबू और बीमारियों से जूझना उनकी नियति बन गई है. हालात इतने खराब हैं कि लोग अपने ही घरों में कैद होकर रह गए हैं और रिश्तेदार तक यहां आने से डर रहे हैं.
सड़कों पर नहीं, नालों में चल रही जिंदगी
तस्वीर में आप जो नाले जैसा देख रहे हैं वह कोई नाला नहीं बल्कि बस्ती की सड़क है, जो नाले में तब्दील हो चुकी. बस्ती के बीच से गुजरने वाला नाला कई महीनों से चोक पड़ा है. जगह-जगह पटिया टूटी हुई हैं या पूरी तरह गायब हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि नाले और सीवर का पानी सड़कों पर बह रहा है. लोगों को रोज उसी गंदे पानी से होकर आना-जाना पड़ता है. कई घरों में तो सीवर का पानी अंदर तक घुस गया है. फर्श पर कीचड़, चारों तरफ बदबू और ऊपर से मच्छरों का आतंक, यही यहां की रोजमर्रा की तस्वीर बन चुकी है. बच्चे स्कूल जाते वक्त फिसलकर गिर रहे हैं, बुजुर्ग घर से बाहर निकलने से डरते हैं. रात होते ही हालात और भी डरावने हो जाते हैं. अंधेरे में खुले नाले जानलेवा साबित हो रहे हैं.
बीमारी का डर, महिलाओं की मुश्किलें
इस गंदगी का सबसे ज्यादा असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ रहा है. महिलाओं का कहना है कि न तो ठीक से नहाने की जगह बची है और न ही शौच के लिए सुरक्षित माहौल. बदबू और गंदगी के कारण घर के अंदर बैठना भी मुश्किल हो गया है. बच्चों में बुखार, खांसी, त्वचा रोग और पेट की शिकायतें बढ़ रही हैं. कई परिवार इलाज पर अपनी जमा-पूंजी खर्च करने को मजबूर हो गए हैं.
शादी है घर में, लेकिन मेहमान नहीं
स्थानीय लोगों की पीड़ा सिर्फ बीमारी तक सीमित नहीं है. मोहन ने बताया कि एक परिवार में 10 दिन बाद बेटी की शादी है, लेकिन इस हालात को देखकर रिश्तेदार आने से मना कर रहे हैं. लोगों का कहना है कि उन्हें शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है. कई घरों में तो हालात से तंग आकर ताले तक लग गए हैं. लोग अस्थायी तौर पर रिश्तेदारों के यहां शरण ले रहे हैं.
शिकायतें बहुत, सुनवाई शून्य
बस्ती के लोगों का आरोप है कि वे लगातार नगर निगम और जनप्रतिनिधियों से शिकायत कर रहे हैं. अधिकारी आए, हालात देखे, फोटो खिंचवाई और चले गए. समस्या जस की तस बनी हुई है. लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है. उनका कहना है कि अगर जल्द समाधान नहीं हुआ तो उन्हें सड़क पर उतरकर विरोध करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.आज गोविंद नगर की यह बस्ती एक बड़ा सवाल खड़ा कर रही है. क्या विकास सिर्फ बड़े इलाकों और कागजों तक सीमित है. क्या इन 27 हजार लोगों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं. स्मार्ट सिटी के दावों के बीच यह इलाका जवाब मांग रहा है, और अब सब्र टूटने की कगार पर है.

