कानपुर. आईआईटी कानपुर पूरी दुनिया में अपनी तकनीक और शोध के लिए जाना जाता है. यहां पर तैयार की गई तकनीक और किए गए शोध पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवा चुके हैं, लेकिन इन दिनों आईआईटी कानपुर में जिस तरह लगातार सुसाइड के मामले सामने आ रहे हैं, कहीं न कहीं आईआईटी कानपुर के नाम पर धब्बा लग रहा है. कानपुर के IIT परिसर से एक बार फिर दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है. अर्थ साइंस विभाग के पीएचडी छात्र ईश्वर राम ने आत्महत्या कर ली है. बताया जा रहा है कि उन्होंने कैंपस की न्यू एसबीआरए बिल्डिंग से छलांग लगाई. गंभीर हालत में उन्हें निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. यह घटना इसलिए भी ज्यादा चिंता पैदा करती है, क्योंकि बीते 22 दिनों में यह दूसरी आत्महत्या है.
शादीशुदा, परिवार साथ
आईआईटी प्रबंधन के अनुसार, ईश्वर राम शादीशुदा थे और पत्नी व बेटी के साथ कैंपस में ही रहते थे. बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य लग रहा था. लेकिन अंदर ही अंदर वह मानसिक दबाव और डिप्रेशन से जूझ रहे थे. पुलिस जांच में भी यही बात सामने आई है कि छात्र काफी समय से तनाव में था और उसकी काउंसलिंग भी कराई जा चुकी थी. आईआईटी जैसे संस्थान देश के सबसे बेहतरीन दिमागों को चुनते हैं. यहां पढ़ाई का स्तर बहुत ऊंचा होता है. कई बार एवरेज या मिड लेवल परफॉर्म करने वाले छात्र खुद को लगातार दबाव में महसूस करते हैं. असाइनमेंट, रिसर्च, गाइड की उम्मीदें और भविष्य की चिंता, ये सब मिलकर छात्रों को मानसिक रूप से तोड़ देते हैं.
चुप्पी बन जाती है खतरनाक
कैंपस से जुड़े काउंसलर्स और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर छात्र अपनी परेशानी किसी से साझा नहीं करते. उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने कमजोरी दिखाई, तो लोग उन्हें असफल मान लेंगे. यही चुप्पी धीरे-धीरे खतरनाक रूप ले लेती है. तनाव, अकेलापन और खुद से उम्मीदें. इन सबका बोझ छात्र अकेले उठाते रहते हैं. आईआईटी कानपुर के ही एक काउंसलर ने ऑफ द रिकॉर्ड बताया कि बीते 1 साल में हुई सुसाइड के मामलों की बात की जाए तो ज्यादातर तो ऐसे लोग थे जो कभी काउंसलिंग कराने ही नहीं आए.
आंकड़े जो डराते हैं..
पिछले दो सालों में आईआईटी कानपुर में आठ आत्महत्याएं हो चुकी हैं. साल 2025 में ही तीन छात्र और एक सॉफ्टवेयर डेवलपर ने जान दी. दिसंबर 2023 से जनवरी 2024 के बीच भी लगातार घटनाएं सामने आई थीं. ये आंकड़े आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के दावों पर सवाल खड़े करते हैं. आईआईटी जैसे संस्थानों में सिर्फ अकादमिक सफलता पर ही नहीं, बल्कि छात्रों की मानसिक सेहत पर भी उतना ही ध्यान देना होगा. परिवार, दोस्त और संस्थान. सभी की जिम्मेदारी है कि बच्चे अकेला महसूस न करें. सवाल सिर्फ एक छात्र की मौत का नहीं है, सवाल उस सिस्टम का है जो होनहार बच्चों को संभाल नहीं पा रहा.सवाल अब भी वही है.

