Uttar Pradesh

अफीम की खेती कैसे होती है, किसानों को कैसे मिलता है लाइसेंस और काला सोना का राज जानने के लिए पढ़ें

अफीम की खेती: एक लाभदायक और चुनौतीपूर्ण फसल

हमारे देश में कई राज्यों में अफीम की खेती की जाती है, लेकिन इसके लिए सख्त नियम और शर्तों का पालन करना होता है। अफीम एक ऐसी फसल है जो आमतौर पर सब नहीं कर सकता है, इसलिए हमारे देश के कुछ ही किसान इसकी खेती कर तगड़ा मुनाफा कमाते हैं।

अफीम की खेती किसानों के लिए काफी लाभदायक मानी जाती है, क्योंकि यह एक ऐसी फसल है जिससे किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। हालांकि, इसकी खेती के लिए केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो से लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य है। अफीम की अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी और जलवायु का अहम योगदान होता है।

लाइसेंस मिलने के बाद, इसकी बुवाई आमतौर पर अक्टूबर और नवंबर में की जाती है। बेहतर उत्पादन प्राप्त करने के लिए किसानों को उन्नत किस्म के बीजों का चयन करना बेहद जरूरी होता है। जिला अफीम अधिकारी करुण बिलग्रामी ने बताया कि अफीम की खेती करना इतना आसान नहीं है, इसके लिए सबसे पहले लाइसेंस लेना होता है और उसके बाद उतनी ही जमीन पर इसकी खेती की जा सकती है।

अफीम की खेती के लिए जमीन का निर्धारण भी गवर्नमेंट स्तर से किया जाता है। अफीम की अच्छी पैदावार के लिए इसकी कुछ उन्नत किस्में हैं, जैसे जवाहर अफीम-539, जवाहर अफीम-16, और जवाहर अफीम-540। ये किस्में प्रमुख हैं और नारकोटिक्स विभाग के अनुसार एक एकड़ की जमीन में इसकी खेती के लिए 2 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है।

फसल बुवाई के समय लाइन से लाइन की दूरी 30 सेमी रखनी चाहिए और पौधे से पौधे की दूरी 30 सेमी होनी चाहिए। अफीम की खेती ठंड के दिनों में की जाती है, अक्टूबर से नवंबर के बीच इसकी बुआई की जाती है। इसके लिए खेत को 3 से 4 बार अच्छे से जोतकर गोबर की खाद या वर्मी कंपोस्ट डाली जाती है।

अफीम की खेती जिस जगह करनी है, इसकी जानकारी नारकोटिक्स डिपार्टमेंट के अधिकारियों को देनी होती है। अधिकारी मौके पर पहुंचकर स्थलीय निरीक्षण करते हैं। अफीम की खेती मुनाफेदार तो है, लेकिन किसानों के लिए उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है।

इस फसल में कीट-रोग लगने की काफी संभावना रहती है, इसलिए रोजाना एक बार खेतों की निगरानी की जाती है। इसके अलावा विशेषज्ञों की सलाह पर हर 8 से 10 दिनों के भीतर कीटनाशकों का छिड़काव भी किया जाता है, ताकि फसल को नुकसान से बचाया जा सके। काले सोने यानी अफीम की खेती के लिए तीन से चार महीने का समय लगता है।

असल में एक बार बीज बोने पर 100 दिन में अफीम का पौधा तैयार हो जाता है, जिसमें फूल की जगह पर डोडे लग जाते हैं। इस डोडे से अफीम निकालने के लिए उसमें एक विशेष प्रकार का चीरा लगाया जाता है, जिससे एक तरल पदार्थ निकलता है। जो पूरी रात निकलता रहता और सुबह धूप पड़ने से पहले उसे कलेक्ट किया जाता है।

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