Uttar Pradesh

कड़ा धाम का जलहरी कुंड बना आस्था का केंद्र, माता शीतला की कृपा का प्रतीक माना जाता है प्रसाद

Last Updated:February 06, 2026, 21:21 ISTKaushambi news: कौशाम्बी जनपद के कड़ा धाम में स्थित माँ शीतला देवी मंदिर का ‘जलहरी कुंड’ आस्था और श्रद्धा का एक अत्यंत पवित्र एवं चमत्कारी स्थल माना जाता है. यह कुंड वर्षों से भक्तों की गहरी आस्था का केंद्र रहा है और दूर-दूर से श्रद्धालु यहाँ माता के दर्शन व पूजन के लिए आते हैं. मंदिर परिसर में स्थित जलहरी कुंड की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि जल पान करने से सारे काम पूरे होते हैं. ख़बरें फटाफटकौशांबी: कड़ा धाम में स्थित माँ शीतला देवी मंदिर का जलहरी कुंड आस्था और श्रद्धा का एक अत्यंत पवित्र एवं चमत्कारी स्थल माना जाता है. यह कुंड वर्षों से भक्तों की गहरी आस्था का केंद्र रहा है और दूर-दूर से श्रद्धालु यहाँ माता के दर्शन व पूजन के लिए आते हैं. मंदिर परिसर में स्थित जलहरी कुंड की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु इसमें दूध, जल और फल अर्पित करते हैं. इसके बाद कुंड के जल को प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं के बीच वितरित किया जाता है. मान्यता है कि यह प्रसाद माता शीतला की विशेष कृपा का प्रतीक होता है.

51 शक्तिपीठों से एक है कड़ा धाम

कड़ा धाम 51 शक्तिपीठ में मां शीतला का प्रसिद्ध मंदिर है यहां माता सती के दाहिने हाथ का पंजा कड़ा सहित गिरा था. इसलिए इस स्थान का नाम कड़ा धाम हुआ. यहां प्रदेश एवं देश के कोने कोने से हजारों श्रद्धालु मां शीतला का दर्शन करने पहुंचते हैं. दर्शन से पहले वह कड़ा के विभिन्न घाटों में गंगा स्नान करते हैं ऐसे में धाम क्षेत्र की महत्ता प्रदेश और देश स्तर तक बढ़ जाती है,इसलिए कड़ा धाम में इलेक्ट्रॉनिक शव दाह ग्रह बन जाने से शव गंगा में नहीं तैरेंगे जिससे श्रद्धालु भक्तों की आस्था आहत नहीं होगी.

कुंड का जल ग्रहण करने से कष्ट होते हैं दूर

मंदिर के पुरोहितों और स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार, कुंड का यह जल श्रद्धा भाव से ग्रहण करने पर अनेक कष्टों दूर जो जाते है. खासकर यह विश्वास प्रचलित है कि जिन लोगों को माता शीतला से जुड़ी बीमारियाँ या दाने निकलने जैसी समस्याएँ होती हैं, वे माता के जल को श्रद्धा के साथ ग्रहण करने और शरीर पर लगाने से लाभ अनुभव करते हैं. भक्त इसे माँ की करुणा और चमत्कार के रूप में देखते हैं. मंदिर के पुरोहित में रामायण पांडा ने बताया कि मुख्य रूप से जो माता का दाहिने हाथ का पंजा एवं कड़ा गिरा था। मंदिर परिसर में जो कुंड बना हुआ है उसी में समाहित है. इसलिए माता शीतला के दरबार में मुख्य रूप से कुंड की पूजा की जाती है.

दुनिया में नहीं मिलता है ऐसा कुंड

ऐसा कुंड विश्व के कहीं भी मंदिरों में देखने के लिए नहीं मिलेगा. इसलिए भक्तगण माता का दर्शन करने आते हैं तो अपनी मान्यता को मानते हैं. अगर उन भक्तों की मनोकामना पूर्ण होती है तो लोग जलहरी कुंड में फल और दूध एवं मंदिर परिसर के सामने बने कुएं से ही जल निकालकर कुंड को भराते है. इसलिए कहा जाता है कि लोग रोते हुए आते हैं और अपनी कामनाओं को पूरा करते हुए माता के दरबार से हंसते हुए अपने घरों को जाते हैं. माता शीतला दरबार के कुंड का निकला जल एक अमृत रूप का जल होता है. लोग जिस भावना से इस जल को पान करेंगे वैसे ही लोगों को फल प्राप्त होंगे.

इसी कुंड में विराजमान हैं शीतला माता

शारदा प्रसाद पांडा ने बताया कि माता शीतला इसी कुंड में विराजमान है इसलिए प्रमुख रूप से भक्तगण कुंड की ही पूजा करते हैं. भक्तों की मनोकामना पूर्ण होने पर दूध जल एवं फल से उसे कुंड को भरवाते हैं. इसलिए भक्त लोग माता के दरबार में बने खून से जल लेकर अपने घरों पर लेकर जाते हैं. लोग उस जल को चरणामित समझकर ग्रहण भी करते है. इस जल को लोग घरों मे छोड़कते है जिससे घरों की भौबाधा भी ठीक हो जाता है. शारदा प्रसाद पांडे ने कहा अगर किसी व्यक्ति के चेचक या दाना निकलते हैं तो माता के दरबार के बने कुंड से लोग जल ले जाकर उसे पन करते हैं और पूरे शरीर पर लगाते हैं. इससे माता शांत हो जाती है और लोगों की समस्या भी ठीक हो जाती है। इसलिए यह कुंड बहुत ही प्रसिद्ध कुंड माना जाता है.About the AuthorRajneesh Kumar Yadavमैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ेंLocation :Kaushambi,Uttar PradeshFirst Published :February 06, 2026, 21:21 ISThomeuttar-pradeshकड़ा धाम का जलहरी कुंड बना आस्था का केंद्र, माता शीतला का है प्रतीक

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