Last Updated:December 27, 2025, 15:24 ISTGorakhpur AIIMS News: एम्स के विशेषज्ञों का कहना है कि, पारंपरिक माइक्रोस्कोपी टेस्ट भले ही सस्ता हो, लेकिन इसमें कई बार टीबी के बैक्टीरिया पकड़ में नहीं आ पाते. वहीं, ट्रूनेट और अन्य एडवांस मॉलिक्यूलर तकनीक से जांच करने पर पहचान की दर काफी बेहतर हो जाती है. इससे इलाज में देरी नहीं होती और मरीज को समय पर सही दवा मिल पाती है.ख़बरें फटाफटगोरखपुरः टीबी जैसी गंभीर बीमारी अगर शुरुआती दौर में पकड़ में आ जाए, तो इसका इलाज न सिर्फ आसान हो जाता है बल्कि मरीज की जान भी बचाई जा सकती है. गोरखपुर स्थित एम्स (AIIMS) में किए गए एक ताजा अध्ययन ने इसी दिशा में बड़ी उम्मीद जगाई है. इस रिसर्च में यह सामने आया है कि, नई और तेज मॉलिक्यूलर जांच तकनीक के जरिए टीबी की पहचान पहले की तुलना में कहीं ज्यादा जल्दी और सटीक तरीके से हो रही है.
4 हजार से अधिक मरीजों के सैंपल पर जांच
एम्स गोरखपुर के माइक्रोबायोलॉजी विभाग द्वारा किए गए इस अध्ययन में कुल 4,249 मरीजों के क्लीनिकल सैंपल की जांच की गई. यह रिसर्च सिर्फ गोरखपुर तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक तृतीयक केयर अस्पताल के आंकड़ों को भी इसमें शामिल किया गया. अध्ययन के नतीजों ने साफ किया कि मॉलिक्यूलर टेस्ट, पारंपरिक माइक्रोस्कोपी जांच की तुलना में टीबी की पहचान में कहीं ज्यादा कारगर साबित हो रहा है.
रिसर्च के मुताबिक, टीबी से सबसे ज्यादा प्रभावित मरीज 18 से 40 वर्ष की आयु वर्ग के पाए गए, जिनकी हिस्सेदारी करीब 38 प्रतिशत रही. इसके बाद 41 से 60 वर्ष आयु वर्ग के मरीजों की संख्या अधिक रही. एक अहम बात यह भी सामने आई कि पुरुष मरीजों की संख्या महिलाओं की तुलना में ज्यादा पाई गई, लक्षणों की बात करें तो सबसे आम लक्षण खांसी रहा, जो करीब 71.5 प्रतिशत मरीजों में देखा गया, जबकि बुखार की शिकायत 42.7 प्रतिशत मामलों में सामने आई.
एडवांस लेवल पर जांच से मिल रहा फायदा
अध्ययन में यह भी खुलासा हुआ कि मॉलिक्यूलर जांच से न सिर्फ टीबी की पुष्टि जल्दी होती है, बल्कि दवा प्रतिरोध (ड्रग रेजिस्टेंस) के मामलों की पहचान भी आसान हो जाती है. रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में रिफैम्पिसिन रेजिस्टेंस भी सामने आया, जिससे यह तय करने में मदद मिली कि मरीज को कौन-सी दवा दी जानी चाहिए. एम्स के विशेषज्ञों का कहना है कि, पारंपरिक माइक्रोस्कोपी टेस्ट भले ही सस्ता हो, लेकिन इसमें कई बार टीबी के बैक्टीरिया पकड़ में नहीं आ पाते. वहीं, ट्रूनेट और अन्य एडवांस मॉलिक्यूलर तकनीक से जांच करने पर पहचान की दर काफी बेहतर हो जाती है. इससे इलाज में देरी नहीं होती और मरीज को समय पर सही दवा मिल पाती है.About the AuthorRajneesh Kumar Yadavमैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ेंLocation :Gorakhpur,Uttar PradeshFirst Published :December 27, 2025, 15:24 ISThomeuttar-pradeshइस एडवांस लेवल की जांच से आसानी से पकड़ में आ जाते हैं टीबी के लक्षण

