गोरखपुर में गुलाब की पंखुड़ियों और चीनी से तैयार गुलकंद सिर्फ मीठे पान का स्वाद बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर को ठंडक देता और कई शारीरिक समस्याओं में राहत देता है. प्राणनाथ इलाके का गुलकंद मुरब्बा खास लोकप्रिय है. पान में गुलकंद स्वाद बढ़ाने और मुंह में ठंडक देने के लिए इस्तेमाल होता है, जबकि मुरब्बा, शरबत, लस्सी और मिठाइयों में भी इसका व्यापक उपयोग है. आयुर्वेद के अनुसार इसकी ठंडी तासीर पेट की गर्मी कम करती है, पाचन सुधारती है, एसिडिटी और कब्ज में राहत देती है, मुंह की बदबू कम करती है और शरीर को हल्की ऊर्जा भी प्रदान करती है. गोरखपुर में भी गुलकंद का इस्तेमाल अलग-अलग रूपों में किया जाता है. शहर के प्राणनाथ इलाके में गुलकंद से तैयार होने वाला खास ‘मुरब्बा लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है और गर्मियों में इसकी मांग बढ़ जाती है.
भारत में गुलकंद का सबसे ज्यादा इस्तेमाल मीठे पान में किया जाता है, पान के अंदर गुलकंद डालने से उसका स्वाद बढ़ जाता है और मुंह में ठंडक भी महसूस होती है. यही वजह है कि पान की दुकानों पर गुलकंद हमेशा प्रमुख सामग्री के रूप में मौजूद रहता है. इसके अलावा, गुलकंद का उपयोग सिर्फ पान तक सीमित नहीं है, कई जगहों पर इससे ‘मुरब्बा, शरबत, लस्सी, मिल्कशेक और मिठाइयां भी बनाई जाती हैं. गोरखपुर के प्राणनाथ इलाके में गुलकंद का मुरब्बा तैयार किया जाता है, जिसे लोग बड़े चाव से खाते हैं. इसका स्वाद मीठा और हल्का ठंडक देने वाला होता है, जो गर्मी के मौसम में खास राहत देता है.
आयुर्वेद के अनुसार गुलकंद की तासीर ठंडी होती है, इसलिए गर्मी के मौसम में इसका सेवन शरीर के तापमान को संतुलित रखने में मदद करता है. यह पेट की गर्मी को कम करता है और शरीर को ठंडक देता है. साथ ही ये पेट के लिए फायदेमंद होता है, पाचन को बेहतर बनाता है और एसिडिटी की समस्या में राहत देता है. शरीर को ठंडक, गर्मी और लू से बचाने में मदद करता है. कब्ज में राहत, नियमित सेवन से कब्ज की समस्या कम हो सकती है. मुंह की बदबू दूर, गुलकंद खाने से मुंह की दुर्गंध कम होती है, ऊर्जा बढ़ाने में सहायक, यह शरीर को हल्की ऊर्जा भी देता है.
गुलकंद भारतीय खानपान की एक ऐसी परंपरा है जो स्वाद और सेहत दोनों को साथ लेकर चलती है. चाहे पान के रूप में हो या मुरब्बे के तौर पर, इसका इस्तेमाल लोगों को खास स्वाद के साथ स्वास्थ्य लाभ भी देता है. गोरखपुर जैसे शहरों में इसकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है और गर्मियों के मौसम में इसकी मांग और भी बढ़ जाती है.

