गाजीपुर. तेज होती मशीनों और ऑटोमेशन के इस दौर में गाजीपुर का छोटा सा गांव पहाड़पुर कलां आज भी अपने हाथों के हुनर से पहचान बनाए हुए है. यहां न फैक्ट्रियों का शोर है, न बिजली से चलने वाली मशीनें. यहां जूट के धागों की सरसराहट है और पीढ़ियों से चली आ रही एक ऐसी कला, जिसने इस गांव को देश-दुनिया के नक्शे पर ला खड़ा किया है. यही वजह है कि पहाड़पुर कलां की जूट वॉल हैंगिंग को साल 2018 में GI टैग (GI No. 314) मिला. यह टैग सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि इस कला की प्रामाणिकता और कारीगरों के अधिकारों की सुरक्षा भी है. इस कला की शुरुआत करीब 50 साल पहले इसराइल अंसारी ने की थी.
लोकल 18 से बात करते हुए वे कहते हैं कि उस वक्त गांव में वो खादी और सामान्य बुनाई का काम करते थे. कुछ अलग करने का विचार आया. लकड़ी के फ्रेम पर जूट के धागों से चांद और सूरज का डिजाइन तैयार किया. यह डिजाइन उन्होंने एक एजेंट को दिखाया, जिसे यह तुरंत पसंद आ गया. यहीं से पहाड़पुर की जूट वॉल हैंगिंग ने बाजार में कदम रखा. सबसे अहम बात यह रही कि इसराइल अंसारी ने इस कला को अपने तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने पूरे गांव को ये हुनर सिखाया. आज पहाड़पुर कलां के सैकड़ों घरों में यही काम हो रहा है.
कैसे बनती है जूट वॉल हैंगिंग
इस हस्तशिल्प का निर्माण पूरी तरह बिजली के बिना और हस्तनिर्मित होता है. कच्चा जूट मुख्य रूप से कोलकाता से आता है. सबसे पहले जूट को ब्लीच कर सफेद किया जाता है, फिर प्राकृतिक रंगों से डाई किया जाता है. रंगाई के बाद जूट को धूप में सुखाया जाता है. इसके बाद कारीगर पारंपरिक मैनुअल पिट-लूम (गड्ढा करघा) पर बुनाई करते हैं. छोटे आकार की वॉल हैंगिंग एक कारीगर बना लेता है, लेकिन बड़े आकार की कलाकृतियों के लिए 7 से 8 कारीगरों की टीम कई दिनों तक काम करती है. बुनाई के बाद उस पर एम्ब्रॉयडरी, पैचवर्क, मोती, सिल्क-केला यार्न और मखमल का काम किया जाता है. अंत में डंडा, टांगने का हुक, सफाई और फिनिशिंग होती है. पूरा प्रोसेस 1 से 7 दिन तक चल सकता है.
कहां तक पहुंच
पहाड़पुर की ये वॉल हैंगिंग दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, कोलकाता जैसे शहरों के मेलों और प्रदर्शनियों तक पहुंचती हैं. वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) योजना के तहत इन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच मिला है. कीमत ₹500 से ₹10,000 तक होती है, डिजाइन और आकार के अनुसार. लोकल 18 की ग्राउंड रिपोर्टिंग में सामने आया कि इस पेशे से सबसे ज्यादा महिलाएं जुड़ी हुई हैं. इनमें से अधिकांश महिलाओं ने पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की है, लेकिन हुनर के दम पर वे परिवार की आमदनी में बड़ी भूमिका निभा रही हैं. पुरुष कारीगरों में कई स्नातक हैं, जो सिर्फ उत्पादन नहीं बल्कि बिक्री और मार्केटिंग भी संभाल रहे हैं.
मोबाइल से बाजार तक
कारीगरों ने बताया कि डिजिटलीकरण ने इस पेशे को नया मोड़ दिया है. एंड्रॉयड मोबाइल फोन के जरिए सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उत्पादों का प्रचार हो रहा है. इसके चलते लगभग 10 प्रतिशत तक बिक्री बढ़ी है. अधिकांश कारीगरों की उम्र 36 से 40 वर्ष के बीच है, जो यह बताता है कि यह सिर्फ विरासत नहीं, बल्कि आज भी एक जीवित और टिकाऊ रोजगार है. इस सामाजिक-आर्थिक बदलाव पर गाजीपुर के मनीष कुमार यादव, शोधार्थी (PhD Scholar), अर्थशास्त्र विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय शोध कर रहे हैं. इस शोध का मार्गदर्शन डॉ. गरिमा मौर्य, सहायक प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग कर रही हैं. शोध में यह सामने आया है कि डिजिटलीकरण ने पहाड़पुर कलां के कारीगरों की बाजार तक पहुंच आसान की है और उनकी आय में सकारात्मक बदलाव आया है.
कितनी कमाई
इस काम से एक कारीगर ₹300–400 प्रतिदिन तक कमा लेता है. यह काम न सिर्फ रोजगार देता है, बल्कि आत्मसम्मान भी. पहाड़पुर कलां आज इस बात का उदाहरण है कि अगर परंपरा, हुनर और समय के साथ बदलाव एक साथ चलें, तो गांव भी ग्लोबल पहचान बना सकता है.

