Saliva Indicating Disease Signs: कोविड महामारी के बाद से ही थूक से बीमारी की जांच करने का ट्रेंड तेजी से बढ़ा है. कोविड के दौरान भारत समेत कुछ देशों ने थूक से टेस्ट किया. ब्लड टेस्ट या बायोप्सी की तुलना में थूक से टेस्ट करना आसान है, यह बिना दर्द के और कम खर्च में किया जा सकता है. साइंटिस्ट ने दशकों से थूक से बीमारियों का पता लगाया है. 1980 के दशक में थूक से हार्मोन और ड्रग्स की जांच की जाती थी. वहीं 1990 के दशक में HIV की जांच के लिए भी थूक का इस्तेमाल होता था.
अब क्या बदलाव आया?समय के साथ-साथ टेक्नोलॉजी और भी ज्यादा तेज और डेवलप हो गई है, जिससे थूक से बहुत ही छोटे लेवल पर बदलाव किए जा सकते हैं. जो कि पहले मुमकिन नहीं था. थूक में DNA, RNA, प्रोटीन और फैट के छोटे-छोटे पार्ट्स होते हैं, जो बीमारी के समय दलते हैं. साइंटिस्ट की माने तो थूक से डायबिटीज, पार्किंसन, हार्ट डिजीज और कुछ कैंसर का भी पता लगाया जा सकता है. इतना ही नहीं, थूक से अल्जाइमर जैसी दिमागी बीमारी का भी पता लगाया जा सकता है.
डेंटिस्ट्री में भी इस्तेमालदांतों की देखभाल और इससे जुड़ी बीमारियों का भी पता थूक से लगाया जा सकता है. जैसे- मसूड़ों की बीमारी और दांत खराब होने के खतरे को भी पता लगाया जा सकता है.
थूक से कैसै की जाती है पहचान?थूक से बीमारियों के पहचान रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी की मदद से की जाती है, यह एक नई लाइट बेस्ट टेक्निक, जो थूक में छिपे केमिकल बदलाव को पहचानने का काम करते हैं. इसमें थूक पर हल्की रोशनी डाली जाती है, जो शरीर के अंदर चल रही एक्टिविटी की “फिंगरप्रिंट” की तरह होता है. यह टेक्निक कैंसर और दूसरी बीमारियों की पहचान करने के लिए इस्तेमाल की जा रही है. खासकर मुंह के कैंसर में इसे सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है. इतना ही नहीं स्ट्रेस लेवल से लेकर इंफेक्शन तक की जांच के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है.
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी घरेलू नुस्खों और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. इसे अपनाने से पहले चिकित्सीय सलाह जरूर लें. ZEE NEWS इसकी पुष्टि नहीं करता है.
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