Uttar Pradesh

Explainer: नोएडा में दलदल में कार गिरने से मौत के बाद क्या कानूनी अधिकार, कौन जिम्मेदार

नोएडा के सेक्टर 150 में 16-17 जनवरी 2026 की रात को 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत हो गई, जब उनकी SUV घने कोहरे में एक निर्माण स्थल पर 20 फीट से ज्यादा गहरे पानी भरे गड्ढे में गिर गई. परिवार का आरोप है कि साइट पर बैरिकेड्स, रिफ्लेक्टर्स या अन्य सुरक्षा उपायों की कमी थी, जिसके कारण यह हादसा हुआ. बचाव अभियान में देरी भी बताई गई है. NDRF की टीम ने सुबह 4:30 बजे शव निकाला. अब जानते हैं कि ऐसे मामलों में कानून किसको जिम्मेदार मानता है और कौन से कानून इसको कवर करते हैं. यहां तक कि अगर शहर में नाले और गटर खुले हों और ऐसे हादसे हो जाएं तो कानून कार्रवाई हो सकती है. अदालत ऐसे मामलों में पहले भी कार्रवाई कर चुका है.

वैसे पीड़ित परिवार की शिकायत पर एफआईआर दर्ज हो चुकी है. ये एफआईआर भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 105, 106(1) और 125 के तहत हुई है। यह लापरवाही से मौत के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों या संस्थाओं के खिलाफ है. पुलिस जांच कर रही है. विशेष जांच दल यानि स्पेशल इनवेस्टिगेटिव टीम गठित की गई है.तो जानते हैं कि पीड़ित परिवार या ऐसे मामलों के भुक्तभोगी कैसे अदालत में इस मामले को आगे बढ़ा सकते हैं, जहां दोषियों को सजा और जुर्माना हो सकता है.

क्या मुकदमा हो सकता है
ऐसे मामलों में बिल्कुल मुकदमा हो सकता है. परिवार मुआवजे के लिए सिविल कोर्ट में केस दायर कर सकता है. यह लापरवाही पर आधारित हो सकता है, जहां वे नोएडा अथारिटी और डेवलपर्स से हर्जाना मांग सकते हैं. भारतीय कानून में, सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने में विफलता के लिए मुआवजा मिल सकता है.

किसकी जिम्मेदारी है?
यह हादसा मुख्य रूप से प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम माना जा रहा है. साइट का रखरखाव और सुरक्षा नोएडा अथारिटी की बनती है. बेशक शासन ने नोएडा अथारिटी के सीईओ लोकेश एम को हटा दिया है, एक जूनियर इंजीनियर को सस्पेंड किया है. और अन्य अधिकारियों को नोटिस जारी किया है. इस गड्ढ़े को लेकर पहले से चेतावनी दी जा चुकी थी लेकिन गड्ढा नहीं भरा. यह एक पुराना स्पोर्ट्स सिटी प्रोजेक्ट था, जिसे ₹9000 करोड़ का घोटाला कहा गया है.

इसमें डेवलपर्स को जिम्मेदार मानते हुए एक डायरेक्टर को भी गिरफ्तार किया जा चुका है. वे निर्माण साइट पर सुरक्षा उपाय करने में विफल रहे. FIR उनके खिलाफ भी है.

क्या परिवार मुकदमा कर सकता है?
हां. पुलिस में शिकायत दर्ज कराकर और बाद में कोर्ट में मुकदमा चलाकर परिवार जिम्मेदार अधिकारियों या अन्य पक्षों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकता है. ये मामले बनते हैं1. आपराधिक मामला – भारतीय दंड संहिता की धारा 304A (ग़लती से मृत्यु) के तहत पुलिस में FIR दर्ज करवा सकते हैं. यह धारा कहती है कि जो व्यक्ति लापरवाही या बेपरवाही के कारण किसी की मृत्यु का कारण बने, उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो सकती है. अगर नाला खुले रहने के कारण या लंबे समय से दलदल होने के कारण पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं थे, तो इसे गंभीर लापरवाही माना जा सकता है.

2. सिविल दावा – कोर्ट या नागरिक हर्जाने का दावा. परिवार स्थानीय सिविल अदालत में राज्य, नगर निगम, अन्य जिम्मेदार निकाय के खिलाफ दावा कर सकता है कि उनकी लापरवाही से व्यक्ति की जान गई और उन्हें मुआवज़ा मिलना चाहिए.

क्या ऐसे मामले कोर्ट में पहले भी पहुंचे हैं
– लखनऊ में खुले नाले में गिर कर मौत के बाद परिवार ने FIR दर्ज करवाई, आरोप था कि निगम और कर्मचारियों, अधिकारियों ने पुरानी चेतावनी के बावजूद नाले को नहीं ठीक किया.

– बॉम्बे उच्च न्यायालय ने ऐसे मामलों में नगर निकायों को मृतक के परिवार को लाखों रुपये मुआवज़ा देने का आदेश भी दिया है.

क्या हमारे देश में ऐसे मामलों के लिए कानून है?
भारत में विशेष कोई अलग से खुले नालों के लिए कोई कानून नहीं है, लेकिन कई मौजूदा कानून इन स्थितियों को कवर करते हैं1. भारतीय दंड संहिता (IPC) –धारा 304A – मौत के लिए लापरवाही. अन्य प्रासंगिक धाराएं जैसे गलत निर्माण, सुरक्षा न होने पर आपराधिक आरोप लग सकते हैं.

2. नगर निगम, नगर पालिका और पुल सड़क निर्माण विभागों पर सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखने की अनिवार्य जिम्मेदारी होती है. अगर उन्होंने उचित संकेत, बैरिकेड, ढक्कन आदि नहीं लगाए, तो यह घरेलू कानून के तहत लापरवाही माना जाता है.

3. न्यायिक निर्णय – अदालतें ऐसी मौतों में नगर निकाय को सज़ा देती हैं या जिम्मेदार ठहराती रही हैं. मृतक के परिवार को वित्तीय मुआवज़ा देने के निर्देश भी देती हैं.4. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग – खुले नालों जैसी लापरवाही के कारण मौतों पर मानवाधिकार आयोग ने नोटिस भी जारी किया है, क्योंकि यह नागरिकों के सुरक्षा अधिकारों का उल्लंघन माना गया.

किसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है?
– नगर निगम, नगरपालिका, ज़िला प्रशासन और मुख्य जिम्मेदार– कॉन्ट्रैक्टर – ठेकेदार – अगर उसने नाले को ठीक ढंग से नहीं बंद किया है तो– संबंधित इंजीनियर और अधिकारी – दायित्व में लापरवाही पर– अन्य विभाग – अगर नाला किसी अलग विभाग के अधीन था.प्रशासन के खिलाफ FIR दर्ज हो सकती है. बाद में कोर्ट में न्यायालयीन समीक्षा जवाबदारी तय करने के लिए नागरिक मुकदमा भी रजिस्टर्ड किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट बार-बार कह चुका है कि “खुले गड्ढे, मैनहोल और नाले राज्य की असफलता हैं.

अगर प्रशासन ये कहे कि कोई लापरवाही नहीं हुई, तब भी अदालत का मामला बन सकता है. अगर तथ्यों से साबित हो कि सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया था, तो न्यायालय आदेश दे सकता है– परिवार को मुआवज़ा दिया जाए– अधिकारियों के खिलाफ जवाबदेही तय की जाए– भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के निर्देश दिए जाएं

क्या ऐसे मामलों में जनहित याचिका संभव
अगर मामला सामाजिक सुरक्षा की विफलता है तो उच्च न्यायालय में PIL दायर की जा सकती है.

खुले नालों को लेकर भी क्या कोई नियम
भारतीय क़ानून में एक स्थापित सिद्धांत है कि सार्वजनिक जगह पर कोई भी ढांचा अगर जान–माल के लिए ख़तरा है, तो उसे सुरक्षित करना राज्य और नगर निकाय की बाध्यकारी ज़िम्मेदारी है. इसमें सड़कें, गड्ढे, मैनहोल और नाले सब शामिल हैं.

खुले नालों को लेकर क्या नियम 
– नाले खुले नहीं छोड़े जा सकते. खासकर रिहायशी इलाकों, सड़कों, बाज़ारों, स्कूलों, ऑफिस एरिया में नाले. ये या तो पूरी तरह ढके होने चाहिए या फिर मजबूत ग्रिल, स्लैब और ढक्कन से सुरक्षित. खुले नाले को अस्थायी व्यवस्था कहकर महीनों – सालों तक छोड़ना लापरवाही माना जाता है.

क्या चेतावनी और बैरिकेड जरूरी है
बिल्कुल जरूरी है. अगर किसी कारण से नाला खुला है तो ये सावधानियां जरूर होनी चाहिए. अगर ऐसा नहीं है तो ये आपराधिक लापरवाही मानी जाती है.– बैरिकेड या बैरियर– चेतावनी बोर्ड– रात में रिफ्लेक्टर या लाइट

किन क़ानूनों से यह नियम निकलते हैं?
– नगर निगम या विकास प्राधिकरण कानून– भारतीय दंड संहिता (अगर खुले नाले से हादसा होता है)

धारा 284 / 288 – ख़तरनाक ढांचाधारा 304A – लापरवाही से मौतधारा 337 / 338 – चोट

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