Uttar Pradesh

ईरान के नेता खामेनेई का उत्तर प्रदेश से जुड़ा कनेक्शन, इस छोटे जिले से जुड़ा परिवार का नाता, मौत के बाद कैसे हालात?

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के किंतूर गांव में शोक की लहर

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के किंतूर गांव में ईरान के सुप्रीम अयातुल्लाह सैयद अली खामेनेई की मौत के बाद शोक की लहर है. यहां के स्थानीय लोगों का मानना है कि ईरान की इस्लामी क्रांति के नेता अयातुल्ला रूहुल्लाह मुसावी खुमैनी के पूर्वजों का रिश्ता इसी गांव से जुड़ा रहा है. उनके दादा सैयद अहमद मुसावी का जन्म यहीं हुआ था, जिनका परिवार करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले भारत से ईरान चला गया था और वहीं पर बस गया था.

सैयद अहमद मुसावी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े थे. साल 1834 में वे धार्मिक यात्रा के उद्देश्य से ईरान गए थे, लेकिन अंग्रेजी शासन ने उन्हें भारत लौटने की अनुमति नहीं दी. इसके बाद वे ईरान के खुमैन शहर में बस गए. यहीं उनके परिवार में आगे चलकर खुमैनी का जन्म हुआ, जिन्होंने 1979 की इस्लामी क्रांति का नेतृत्व किया था. खामेनेई, खुमैनी के शिष्य माने जाते थे और उनके निधन के बाद उन्होंने ही उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाया थी.

किंतूर गांव के स्थानीय लोगों का मानना है कि खामेनेई के वंशजों का भारत से गहरा संबंध है. उनके दादा सैयद अहमद मुसावी की कहानी भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

अयातुल्ला खामेनेई के वंशज डॉ. रेहान काजमी ने बताया कि जो सैयद अहमद मौसवी थे, वह 1834 और 1835 में लखनऊ के मौलवी के साथ जियारत के लिए वह गए थे, क्योंकि वह यहां भारत की क्रांति में हिस्सा ले रहे थे. इस वजह से ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें भारत में एंट्री करने नहीं दी, फिर वह वही जाकर बस गए. उनके बेटे हुए, उनके पोते आए, अयातुल्ला खामेनेई आए, जो ईरान क्रांति के जनक हैं.

इमामें खामेनेई का भारत से रिश्ता क्या है

बाराबंकी से रिश्ते को लेकर डॉ. रेहान काजमी ने बताया कि इमामें खामेनेई का यहां से रिश्ता क्या है. इमामें खुमेनेई के खुमैनी सागिर्द थे. इमामें खामेनेई का भारत से रिश्ता था. यहां के संस्कृत जो शायद हम आजकल भूल चुके हैं, इस जमाने में अमेरिका और इजराइल का साथ देने लगे हैं, यह भारत का गौरवमई इतिहास रहा है कि उसने हमेशा शूरवीर पैदा किए हैं.

इमामें खामेनेई भी इनमें से थे. वह यहां बहुत ही प्रभावित थे. उन्होंने पूरी जिंदगी अपने नाम के सामने हिंदी लगाकर रखा. उनके इंतकाल के बाद भी दशकों तक उनके नाम के सामने हिंदी लगा रहा. यहां से जाने के बाद उन्होंने जिस तरीके से ईरान को आजाद कराया है, वह काबिले तारीफ की बात है.

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