शाश्वत सिंह
झांसी. हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की ग्याहरवें दिन या ग्यारस को देवउठनी एकादशी या देव प्रबोधिनी ग्यारस के नाम से जाना जाता है. मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु अपनी चार महीने की नींद से उठते हैं. हिंदू परंपरा के अनुसार इस दिन से सभी शुभ कार्य शुरू किए जाते हैं. देवउठनी एकादशी को तुलसी विवाह की रुप में भी जाना जाता है. इस दिन तुलसी और भगवान विष्णु का विवाह गन्ने के मंडप के नीचे करवाया जाता है. उत्तर प्रदेश के झांसी और बुंदेलखंड में इस दिन गन्ने की पूजा भी की जाती है.
एकादशी के बाद ही गन्ना काटते हैं किसानझांसी के जाने माने इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा ने बताया कि देवउठनी एकादशी के दिन किसान गन्ने की नई फसल की कटाई का काम शुरू करते हैं. इस दिन से पहले कोई भी किसान गन्ने के एक भी पौधे को हाथ तक नहीं लगाता है. मौसम बदलने की वजह से इस दिन से लोग गुड़ का सेवन करना शुरू करते हैं. गुड़ को गन्ने के रस से बनाया जाता है इसलिए इस दिन गन्ने की पूजा का महत्व और अधिक बढ़ जाता है. गन्ने को मीठे का शुभ स्रोत माना जाता है. साथ ही यह माना जाता है कि अगर हम भी अपने व्यवहार में गन्ने जैसी मिठास रखेंगे तो घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहेगी.
11 दीए जलाने होता है शुभपंडित मनोज थापक ने बताया कि इस वर्ष देवउठनी एकादशी तीन नवंबर की शाम 7.30 बजे से शुरू हो जायेगी और चार नवंबर की शाम 6.08 बजे समाप्त हो जायेगी. जो लोग व्रत रखना चाहते हैं वो चार नवंबर को व्रत और पूजा कर सकते हैं. पूजा करने से पहले घर की महिलाएं चूना और आटे से रंगोली बनाती हैं. इसके बाद गन्ने का मंडप तैयार कर भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप की पूजा होती है. इस पूजा में विशेष रूप से 11 दीए जलाए जाते हैं.ब्रेकिंग न्यूज़ हिंदी में सबसे पहले पढ़ें News18 हिंदी| आज की ताजा खबर, लाइव न्यूज अपडेट, पढ़ें सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट News18 हिंदी|Tags: Jhansi news, Up news in hindiFIRST PUBLISHED : October 28, 2022, 18:06 IST
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