Last Updated:January 10, 2026, 06:59 ISTAligarh News: नॉनवेज पसंद करने वालों के लिए सावधानी जरूरी है. एएमयू के शोध के अनुसार आधुनिक पोल्ट्री में चिकन में कोलेस्ट्रॉल और एंटीबायोटिक्स बढ़ गए हैं, जो सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं. सीमित सेवन और देसी चिकन बेहतर विकल्प माना गया है.अलीगढ़. आप भी नॉन वेज खाने के शौकीन हैं और चिकन खाना पसंद करते हैं, तो सावधान हो जाएं. क्योंकि अब चिकन दे सकता है नुकसान. दरअसल, तेज़ी से बदलती खानपान की आदतों में चिकन को लंबे समय तक सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता रहा है, लेकिन आधुनिक पोल्ट्री उद्योग में हो रहे बदलावों ने अब इसके पोषण और सुरक्षा को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं. एएमयू के एग्रीकल्चर माइक्रोबायोलॉजी विभाग के शोधकर्ता शिरजील अहमद सिद्दीकी बताते हैं कि आज का चिकन पहले जैसा शुद्ध प्रोटीन का स्रोत नहीं रहा, बल्कि उसमें कोलेस्ट्रॉल और एंटीबायोटिक्स की मात्रा बढ़ती जा रही है, जो मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है.
एएमयू के एग्रीकल्चर माइक्रोबायोलॉजी विभाग के शोधकर्ता शिरजील अहमद सिद्दीकी का कहना है कि पहले चिकन को व्हाइट मीट माना जाता था और इसे शुद्ध प्रोटीन का अच्छा स्रोत समझा जाता था. उस समय चिकन आसानी से पचने वाला, हल्का और शरीर के लिए लाभकारी माना जाता था, लेकिन जैसे-जैसे पोल्ट्री उद्योग का औद्योगीकरण बढ़ा और चिकन की खपत में इज़ाफ़ा हुआ, वैसे-वैसे इसके उत्पादन प्रक्रिया में भी बड़े बदलाव आए. आजकल चिकन की तेज़ ग्रोथ के लिए उसे तरह-तरह के सप्लीमेंट्स और फ़ीड दी जाती है, जो पहले इस्तेमाल नहीं होती थी.
शिरजील का कहना है कि इन सप्लीमेंट्स का असर यह हुआ कि अब चिकन के मांस में फैट की परत दिखाई देने लगी है. जिसे आमतौर पर कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है. पहले जहां चिकन मुख्य रूप से प्रोटीन का स्रोत था, वहीं अब उसमें कोलेस्ट्रॉल की मात्रा भी काफ़ी बढ़ गई है. इसका सीधा असर इंसान की सेहत पर पड़ता है, क्योंकि प्रोटीन के साथ-साथ शरीर में बड़ी मात्रा में कोलेस्ट्रॉल भी प्रवेश कर रहा है, जो दिल की बीमारियों और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ावा देता है. इसके अलावा पोल्ट्री और लाइवस्टॉक फार्मिंग में एंटीबायोटिक्स का अत्यधिक उपयोग भी एक गंभीर समस्या बन चुका है. कई बार बिना किसी बीमारी के केवल बचाव के नाम पर मुर्गियों को एंटीबायोटिक्स दी जाती है. इसका नुकसान यह होता है कि ये दवाइयां पूरी तरह से उनके शरीर से खत्म नहीं होतीं और मांस में मौजूद रह जाती हैं.
उन्होंने कहा कि जब इंसान ऐसे मांस का सेवन करता है, तो शरीर में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ जाता है. कुछ एंटीबायोटिक्स आसानी से डिग्रेड नहीं होतीं, जिससे एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जीन विकसित होने की संभावना बढ़ जाती है. यह भविष्य में गंभीर बीमारियों के इलाज को और मुश्किल बना सकता है. उन्होने कहा कि बचाव के तौर पर विशेषज्ञों का मानना है कि चिकन के सेवन को सीमित किया जाना चाहिए. इसका कोई पूर्ण समाधान नहीं है, लेकिन संतुलित मात्रा में सेवन करके जोखिम को कम किया जा सकता है. यदि कोई व्यक्ति अधिक मात्रा में चिकन खाता है, तो उसे अपनी डाइट पर नियंत्रण रखना चाहिए.
शिरजील कहते हैं कि इसके अलावा देसी विकल्पों को अपनाना भी एक बेहतर उपाय है. देसी मुर्गा या देसी मीट आमतौर पर घरेलू चारे पर पाला जाता है और उसमें केमिकल सप्लीमेंट्स व एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल कम होता है. इससे न केवल सेहत को कम नुकसान होता है, बल्कि स्थानीय और गरीब तबके को भी आर्थिक लाभ मिलता है. इस तरह संतुलित आहार और देसी विकल्पों की ओर रुख करके चिकन से होने वाले संभावित नुकसान से काफी हद तक बचा जा सकता है.About the AuthorLalit Bhattपिछले एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं. 2010 में प्रिंट मीडिया से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की, जिसके बाद यह सफर निरंतर आगे बढ़ता गया. प्रिंट, टीवी और डिजिटल-तीनों ही माध्यमों म…और पढ़ेंLocation :Aligarh,Uttar PradeshFirst Published :January 10, 2026, 06:58 ISThomeuttar-pradeshचिकन खाने वाले हो जाएं सावधान, फायदे की जगह हो सकता है नुकसान

