Uttar Pradesh

बनारस: संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में मंदिर प्रबंधन कोर्स शुरू.

ऐसा लगता है कि बढ़ती धार्मिकता और मंदिर इकोनॉमी के बढ़ने से अब मंदिर ऐसे लोगों से लैस होंगे, जो पूजा – पाठ के अलावा ना केवल मैनेजमेंट के गुर में सिद्धहस्त होंगे बल्कि भीड़ प्रबंधन, प्लानिंग, इवेंट्स में भी दक्ष होंगे. इसी का तकाजा है एक ऐसी पढ़ाई जिसके बारे में अब तक नहीं सुना गया. कांसैप्ट के आधार पर ये दुनिया की एकदम नई तरह की पढ़ाई होगी. हो सकता है कि ये पढ़ाई समय की जरूरत बन जाए.

भारत में धार्मिक अर्थव्यवस्था (रिलीजियस इकोनॉमी) ने हाल के वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है. जिसका प्रमुख कारण धार्मिक पर्यटन में हो रही बढ़ोतरी है. 2022 में नेशनल सैंपल सर्वे आर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत का मंदिर अर्थतंत्र देश की अर्थव्यवस्था में लगभग 3.02 लाख करोड़ रुपये का योगदान कर रहा था, जो उस समय के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 2.32 प्रतिशत था.

2023 में भारत ने 18.89 मिलियन अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों का स्वागत किया, जिससे पर्यटन से 28.07 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा आय हुई. 2028 तक, पर्यटन और आतिथ्य उद्योग से 50,000 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व उत्पन्न होने की उम्मीद है. धार्मिक पर्यटन का इसमें महत्वपूर्ण योगदान है, क्योंकि भारत में करीब 60% पर्यटन धार्मिक और आध्यात्मिक स्थलों से जुड़ा हुआ है.

विशेष रूप से अयोध्या और भगवान राम से जुड़े अन्य स्थलों की तीर्थ यात्राओं की मांग में साल-दर-साल 5 गुना वृद्धि देखी गई है. इसी तरह वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में मार्च 2024 में दान ने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए, जिसमें 11.14 करोड़ रुपये का योगदान हुआ. इस दौरान 95.6 लाख तीर्थयात्रियों ने मंदिर का दौरा किया.

धार्मिक इकोनॉमी खुलने से क्या होगाइन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत में धार्मिक पर्यटन और मंदिरों से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों में निरंतर वृद्धि हो रही है, जो देश की समग्र अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है. इसी वजह से धार्मिक प्रबंधन से जुड़े नए क्षेत्र भी खुल रहे हैं. टैंपल मैनेजमेंट को भी उससे जुड़ा माना जा सकता है. यही वजह है कि दुनिया में इस तरह का कोर्स शुरू करने की जरूरत महसूस की गई. बनारस की जानी मानी संपूर्णानंद संस्कृति यूनिवर्सिटी इस कोर्स को अप्रैल से शुरू कर रही है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Image generated by Meta AI)

क्या होगा टैंपल मैनेजमेंट के जरिएटैंपल मैनेजमेंट (मंदिर प्रबंधन) एक ऐसा क्षेत्र है जो मंदिरों के संचालन, रखरखाव और प्रशासन से संबंधित है. इसमें मंदिरों की आर्थिक व्यवस्था, धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन, श्रद्धालुओं की सुविधाओं का प्रबंधन, मंदिर परिसर की स्वच्छता, सुरक्षा, और सांस्कृतिक-धार्मिक विरासत के संरक्षण जैसे पहलुओं को शामिल किया जाता है. इसके अलावा टैंपल मैनेजमेंट में कर्मकांडों, ज्योतिष और पूजा-पाठ से जुड़े पारंपरिक ज्ञान के साथ-साथ आधुनिक प्रबंधन तकनीकों को भी शामिल किया जाता है. ताकि मंदिरों को कुशलतापूर्वक चलाया जा सके.

विशेष तरह का कोर्स बनारस का सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय (Sampurnanand Sanskrit Vishwavidyalaya) इस क्षेत्र में एक विशेष कोर्स शुरू करने की योजना बना रहा है. यह कोर्स उन लोगों को प्रशिक्षित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है जो मंदिरों में प्रबंधन या धार्मिक कार्यों जैसे अर्चक (पुजारी), ज्योतिषी या धर्मगुरु के रूप में करियर बनाना चाहते हैं. विश्वविद्यालय का उद्देश्य पारंपरिक संस्कृत ज्ञान को आधुनिक प्रबंधन कौशल के साथ जोड़कर छात्रों को तैयार करना है, ताकि वे मंदिरों के संचालन में योगदान दे सकें.

इस कोर्स के जरिए छात्रों को कर्मकांड, ज्योतिष शास्त्र और मंदिर प्रशासन से जुड़े कौशल सिखाए जाएंगे, जिससे वो रोज़गार के अवसर हासिल कर सकें. संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी इस हिसाब से दुनिया में अपने आपमें एकदम नए तरह का कोर्स शुरू कर रहा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Image generated by Leonardo AI)

कब से शुरू होगा ये कोर्सइस कोर्स का नोमिनेशन 1 अप्रैल 2025 से शुरू होगा. ये तीन महीने, छह महीने और सालाना कोर्स होगा. 1 अप्रैल से 15 मई तक ऑनलाइन दाखिले उपलब्ध होंगे. प्रवेश के लिए कोई विशेष योग्यता तय नहीं है.

इसमें क्या पढ़ाया जाएगा– मंदिर निर्माण के सिद्धांत​– मूर्ति प्रतिष्ठा और प्राण प्रतिष्ठा की विधियाँ​– वास्तु शास्त्र के नियम​– भीड़ प्रबंधन​– मंदिर के लिए भूखंड चयन और निर्माण के वास्तुशास्त्रीय सिद्धांत​​क्या दुनिया में इस तरह की पढ़ाई पहली बार हो रही है– दुनिया में कई तरह के धार्मिक अध्ययन और धर्मशास्त्र से संबंधित पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं, मंदिर प्रबंधन पर ऐसी पढ़ाई पहली बार कराई जा रही है. इसके जरिए मंदिर प्रबंधन के क्षेत्र में शिक्षित और प्रशिक्षित पेशेवरों की एक नई पीढ़ी तैयार की जाएगी.

कई देशों में कुछ ऐसी पढ़ाई वैसे कई देशों में धार्मिक अध्ययन (Religious Studies) या थियोलॉजी (Theology) के कोर्स उपलब्ध हैं, जो चर्च, मस्जिद, या अन्य धार्मिक स्थलों के संचालन और प्रबंधन से संबंधित पढ़ाई कराते हैं. उदाहरण के लिए अमेरिका और यूरोप में क्रिश्चियन थियोलॉजी या चर्च मैनेजमेंट से जुड़े कोर्स विश्वविद्यालयों और सेमिनरीज़ में पढ़ाए जाते हैं. ये कोर्स पादरियों या धार्मिक नेताओं को ट्रेंड करते हैं. कुछ देशों में हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट या हेरिटेज मैनेजमेंट के कोर्स होते हैं, जो सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों के संरक्षण और संचालन पर ध्यान देते हैं.

जापान और इजरायल में होती है इस तरह की पढ़ाईजापान में बौद्ध मंदिरों और शिंतो श्राइन के संचालन के लिए कुछ अनौपचारिक प्रशिक्षण या परंपरागत शिक्षण होते हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचालित होते हैं. हालांकि ये कोर्स मठों के भीतर होता है. इसमें मंदिरों की देखभाल, अनुष्ठान, और आर्थिक प्रबंधन शामिल हो सकता है. इज़राइल में रब्बी (Rabbi) प्रशिक्षण कार्यक्रम होते हैं, जो यहूदी धार्मिक स्थलों (सिनागॉग) के संचालन और धार्मिक नेतृत्व से जुड़े हैं.

बनारस का कोर्स कैसे अलगबनारस का यह कोर्स इस मायने में अनोखा है कि यह भारतीय परंपराओं और आधुनिक जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है.

क्या भारत में पुजारी बनाने की पढ़ाई भी होती हैभारत में कई यूनिवर्सिटी और सस्थान पुजारी बनने की पढ़ाई कराते हैं. इसमें काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) वाराणसी, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार, संस्कृत विद्यापीठ तिरुपति, रामकृष्ण मिशन बेलूर मठ और श्रीश्री विश्वविद्यालय ओडिशा शामिल हैं.

चलते चलते ये आंकड़े भी देख लीजिए“मेक माय ट्रिप” की इंडिया ट्रैवल ट्रेंड्स रिपोर्ट के अनुसार, 2023 की तुलना में 2021 में धार्मिक स्थलों के लिए खोजों में 97% की वृद्धि हुई है. विशेष रूप से, अयोध्या के लिए खोजों में 585%, उज्जैन के लिए 359%, बद्रीनाथ के लिए 343%, और केदारनाथ के लिए 322% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

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