इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने मंगलवार को अदालत के कार्यभार और मानवीय सीमाओं की एक नई मिसाल पेश की. उन्होंने 235 मामलों की सूची और शाम 7 बजे तक चली मैराथन सुनवाई के बाद खुले दिल से स्वीकार किया कि वे शारीरिक रूप से थक चुके हैं और उन्हें भूख लगी है, इसलिए वे फैसला लिखवाने की स्थिति में नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिमांड किए गए एक पुराने केस की लंबी बहस के बाद जज ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. यह पूरा मामला साल 2025 में ‘डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल’ (DRT) के खिलाफ दायर एक याचिका से जुड़ा हुआ था. हाई कोर्ट ने मई 2025 में DRT के एक आदेश को रद्द कर दिया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. 25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को इस आधार पर रद्द कर दिया कि दूसरे पक्ष को नहीं सुना गया था. शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया था कि वह 6 महीने के भीतर इस पर नया फैसला सुनाए.
मंगलवार का दिन जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की अदालत के लिए बेहद व्यस्त रहा. उनकी लिस्ट में कुल 235 मामले लगे थे. इनमें 92 नए केस, 101 नियमित मामले, 39 विविध आवेदन और 3 एडिशनल लिस्ट के मामले शामिल थे. दोपहर 4:15 बजे तक जस्टिस विद्यार्थी केवल 29 नए मामलों की ही सुनवाई कर पाए थे. इसी बीच उन्हें सूचित किया गया कि अगला मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिमांड किया गया है और इसकी समय सीमा आज ही समाप्त हो रही है. इसके बाद जस्टिस विद्यार्थी ने इस विशेष मामले की सुनवाई शुरू की, जो लगातार शाम 7 बजे तक चली.
वरिष्ठ वकीलों की लंबी बहस और जज की थकानइस महत्वपूर्ण मामले में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनुज कुदेसिया, प्रतिवादी की ओर से सुदीप कुमार और केनरा बैंक की ओर से पीके श्रीवास्तव ने घंटों तक अपनी दलीलें पेश कीं. शाम 7 बजे जब बहस खत्म हुई, तो अदालत के कमरे में सन्नाटा पसर गया. जस्टिस विद्यार्थी ने पूरी ईमानदारी के साथ कोर्ट रूम में कहा, “चूंकि मुझे भूख लगी है, मैं थक गया हूं और फैसला लिखवाने के लिए शारीरिक रूप से असमर्थ महसूस कर रहा हूं, इसलिए फैसला सुरक्षित रखा जाता है.”
न्यायपालिका में वर्कलोड पर छिड़ी बहसजज की इस टिप्पणी ने सोशल मीडिया और कानूनी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है. यह वाकया दर्शाता है कि भारतीय अदालतों में जजों पर काम का कितना दबाव है. एक ही दिन में 200 से अधिक केस लिस्ट होना और फिर देर शाम तक सुनवाई करना किसी भी व्यक्ति के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है.

