Uttar Pradesh

बच्चों की कल्पना को पंख दे रही ‘बाल-मन’, मोबाइल और डिजिटल दुनिया से निकल बच्चे पहुंच रहे किताब तक

Last Updated:January 11, 2026, 14:44 ISTKanpur News: कानपुर के शेखर यादव की पहल ‘बाल-मन’ में उत्तर प्रदेश के 30 जनपदों के 134 बच्चों की मौलिक रचनाएं शामिल हैं, जो लखनऊ विश्वविद्यालय और विश्व पुस्तक मेला में सराही गईं. शेखर यादव बताते हैं कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भाषा, स्थानीय संस्कृति और रचनात्मकता पर जो ज़ोर दिया गया है, ‘बाल-मन’ उसी सोच का जीवंत उदाहरण है. जब कोई बच्चा पहली बार पुस्तकालय में जाकर अपनी ही लिखी कविता या कहानी को किताब में छपा देखता है, तो उसका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है.कानपुर: आज के समय में जब बच्चों का ज़्यादातर वक्त मोबाइल फोन, वीडियो गेम और सोशल मीडिया के बीच सिमटता जा रहा है, ऐसे दौर में कानपुर से एक बेहद सुकून देने वाली और उम्मीद जगाने वाली कहानी सामने आई है. यह कहानी है बच्चों को फिर से किताबों की ओर लौटाने की, उनकी कल्पनाओं को शब्द देने की और उनके मन की उड़ान को खुला आसमान देने की.

इस अनोखी पहल का नाम है ‘बाल-मन’ एक ऐसी किताब, जिसमें बच्चों की सोच, भावनाएं और रंग-बिरंगी कल्पनाएं मुस्कुराती नजर आती हैं. शिक्षक की पहल, बच्चों की नई दुनियाकानपुर के सहायक अध्यापक शेखर यादव ने महसूस किया कि आज के बच्चे धीरे-धीरे किताबों से दूर होते जा रहे हैं. इसी चिंता को उम्मीद में बदलते हुए उन्होंने बच्चों की रचनात्मक सोच को एक मंच देने का फैसला किया.‘बाल-मन’ इसी सोच का नतीजा है, जहां बच्चों को न सिर्फ लिखने की आज़ादी मिली, बल्कि अपनी बात अपनी ही भाषा और अपने ही अंदाज में कहने का मौका भी मिला.

इस पत्रिका में उत्तर प्रदेश के 30 जनपदों के 134 बच्चों की रचनाएं शामिल की गई हैं. इन बच्चों ने खुद कहानियां लिखीं, कविताएं रचीं और अपनी कल्पना के अनुसार चित्र भी बनाए. हर पन्ना बच्चों की मासूम सोच और सच्ची भावनाओं से भरा हुआ है. स्थानीय भाषा में, दिल से निकली रचनाएं‘बाल-मन’ की सबसे खास बात यह है कि इसमें शामिल सभी रचनाएं पूरी तरह मौलिक हैं और बच्चों ने इन्हें अपनी स्थानीय भाषा में लिखा है. किसी ने मौसम पर कविता लिखी, तो किसी ने अपने माता-पिता के प्यार को शब्दों में उतारा. किसी कहानी मे गांव की खुशबू है, तो किसी कविता में बचपन की शरारत.

शेखर यादव बताते हैं कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भाषा, स्थानीय संस्कृति और रचनात्मकता पर जो ज़ोर दिया गया है, ‘बाल-मन’ उसी सोच का जीवंत उदाहरण है. जब कोई बच्चा पहली बार पुस्तकालय में जाकर अपनी ही लिखी कविता या कहानी को किताब में छपा देखता है, तो उसका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है. बच्चों के सपनों की पहचान बनती ‘बाल-मन’इस किताब की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. अब तक इसकी 300 से अधिक प्रतियां ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिक चुकी हैं.

हाल ही में इसे लखनऊ विश्वविद्यालय में आयोजित गोमती पुस्तक महोत्सव में भी प्रदर्शित किया गया, जहां पाठकों ने इसे खूब सराहा. इतना ही नहीं, अब ‘बाल-मन’ जल्द ही विश्व पुस्तक मेला में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराएगी. छोटी सी उम्र में बड़ी सोच रखने वाली शान्विका यादव की कविता “आम वाला मौसम आया” हो या हिमांशु की भावनात्मक रचना “मेरे पापा सबसे प्यारे हैं”, हर रचना दिल को छू जाती है.About the AuthorAbhijeet Chauhanन्‍यूज18 हिंदी डिजिटल में कार्यरत. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल और हरियाणा की पॉलिटिक्स और क्राइम खबरों में रुचि. वेब स्‍टोरी और AI आधारित कंटेंट में रूचि. राजनीति, क्राइम, मनोरंजन से जुड़ी खबरों को लिखने मे…और पढ़ेंLocation :Kanpur,Kanpur Nagar,Uttar PradeshFirst Published :January 11, 2026, 14:44 ISThomeuttar-pradeshबच्चों की कल्पना को पंख दे रही ‘बाल-मन’, मोबाइल छोड़ किताब पड़ रहे बच्चे

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