कल्पना कीजिए, एक ऐसी दुनिया की जहां बच्चे पैदा करने के लिए स्त्री या पुरुष की जरूरत ही न पड़े. सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी लगती है, लेकिन विज्ञान इसे हकीकत में बदलने की कगार पर है. ब्रिटेन की ह्यूमन फर्टिलाइजेशन एंड एम्ब्रियोलॉजी अथॉरिटी (एचईएफए) ने हाल ही में किए गए एक बड़े खुलासे से पूरी दुनिया को चौंका दिया है. संस्था के अनुसार, वैज्ञानिक प्रयोगशाला में अंडे और शुक्राणु विकसित करने की तकनीक को वास्तविकता में बदलने के बेहद करीब पहुंच चुके हैं. इस तकनीक को इन-विट्रो गैमेट्स (आईवीजी) कहा जाता है, जो आने वाले टाइम में एक बड़ा बदलाव ला सकती है.
आईवीजी एक ऐसी तकनीक है, जिसके जरिए त्वचा या स्टेम सेल्स को जेनेटिक रूप से पुनः प्रोग्राम करके प्रयोगशाला में मानव अंडे और शुक्राणु तैयार किए जाते हैं. एचईएफए के सीईओ पीटर थॉम्पसन ने इस तकनीक को मानव प्रजनन प्रक्रिया में एक क्रांतिकारी कदम बताया है. उन्होंने कहा कि यह तकनीक मानव अंडे और शुक्राणु की उपलब्धता को बढ़ाने की क्षमता रखती है.
क्या होगा इसका फायदा?अगर यह तकनीक सफल होती है और इसे सुरक्षित, प्रभावी और समाज में स्वीकार्यता मिलती है, तो यह कई लोगों के लिए वरदान साबित हो सकती है. यह उन कपल के लिए मददगार हो सकती हैस जो किसी कारणवश संतान पैदा करने में सक्षम नहीं हैं. साथ ही, यह समान-लिंग वाले जोड़ों को भी बायोलॉजिकल बेबी (संतान) का सपना साकार कर सकती है.
क्या हैं इस तकनीक से जुड़े सवाल?वैज्ञानिकों के इस दावे ने कई नैतिक और सामाजिक सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या बिना स्त्री-पुरुष के बच्चे पैदा करना सही होगा? क्या यह प्रक्रिया समाज में परिवार की पारंपरिक अवधारणा को बदल देगी? साथ ही, इसे व्यापक स्तर पर स्वीकार करने में भी समय लग सकता है.
कितनी है संभावना?वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक अगले 10 वर्षों में हकीकत बन सकती है. हालांकि, इसे पूरी तरह से सुरक्षित और प्रभावी साबित करने के लिए और अधिक शोध और टेस्ट की आवश्यकता है.
Disclaimer: प्रिय पाठक, हमारी यह खबर पढ़ने के लिए शुक्रिया. यह खबर आपको केवल जागरूक करने के मकसद से लिखी गई है. हमने इसको लिखने में सामान्य जानकारियों की मदद ली है. आप कहीं भी कुछ भी अपनी सेहत से जुड़ा पढ़ें तो उसे अपनाने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें.
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