Uttar Pradesh

अनोखी है इस गांव की होली, यहां बच्चे गाते हैं गालियां, तो पूरा गांव बनता है कलाकार, जानिए क्यों है ये इतनी स्पेशल

Last Updated:March 12, 2025, 12:59 ISTहोली का त्योहार हमारे देश में धूमधाम से मनाया जाता है. हिंदू हो या मुस्लमान सभी के लिए होली का त्योहार खास होता है. वहीं बलिया के चौरा गांव की होली स्पेशल होती है. यहां पीढ़ी दर पीढ़ी चलती होली का शुभारंभ बसंत …और पढ़ेंX

सदियों पुरानी होली की अनोखी परंपरा…हाइलाइट्सबलिया के चौरा गांव में होली परंपरा सदियों पुरानी है.बच्चे गाते हैं गालियां, गांव वाले बनते हैं कलाकार.हिंदू-मुस्लिम मिलकर मनाते हैं होली, फगुआ गाते हैं.बलिया: आज के आधुनिक युग में होली की तमाम गीत देखने और सुनने को मिल जाते हैं. बात उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की करे तो यहां आज चौरा गांव में सदियों पुरानी परम्परा कायम है. यहां हिन्दू और मुस्लिम के एकता का बेमिसाल देखने को मिलता है. हर कोई होली के रंग डूब जाता है. यह हर घर फगुआ गाया जाता है. इसमें पूरे गांव वाले की कलाकार बन जाते हैं. बच्चे भी अपने बुजुर्गों को देखकर सबकुछ सीख लेते हैं. इस दौरान होलिका दहन के बाद नाथ बाबा मंदिर फगुआ का आयोजन किया जाता है, जिसके बाद सभी लोग खड़े होकर घर-घर घूमकर फगुआ गाते हैं. इसमें युवा माहौल के अनुसार गाली भी गाते हैं, जिसके एवज में उन्हें पानी, गोबर और रंग आदि मिलता है. विस्तार से जानिए…

चौरा निवासी बुजुर्ग वीर बहादुर सिंह और छोटकन ने कहा कि “इस गांव की होली स्पेशल होती है”. यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही है. इसका शुभारंभ बसंत पंचमी से ही हो जाता है. इस अनोखे कार्यक्रम को “फगुआ” कहा जाता है. होलिकादहन के दिन से ये सभी लोग खड़े होकर तीन दिन बाद तक फगुआ हर घर जाकर गाते हैं. फगुआ ढोलक, झाल, मंजीरा और डफली इत्यादि वाद्य यंत्रों के सहारे गाया जाता है. होलिका दहन से इसकी रौनक बढ़ जाती है.

पूरा गांव बनता है कलाकार, बैठकी फगुआ अश्लीलता से दूरबसंत पंचमी से रोज शाम को किसी न किसी के घर यह कार्यक्रम किया जाता है. सबसे बड़ी बात यह सभी लोग गांव के ही होते हैं. हर कोई आपस में मिल जुलकर गाते बजाते हैं. यह फगुआ सूरदास, तुलसीदास, कबीर दास, भागीरथी और गुलाल साहब से जोड़ कर गाया जाता है. सबसे पहले होली रंग उसके बाद होली मनोरवा, नारदी दुगोलवा आदि का गायन किया जाता है.

हिंदू-मुस्लिम सब मिलकर मनाते हैं होली

रणधीर सिंह ने कहा कि “सुबह होलिका दहन के दौरान सभी लोग खड़ा होकर के फगुआ गाते हैं. उसके बाद, घर पर बने पकवान का आनंद लेते हुए रंग खेलते हैं. अंत में शाम को यह सभी लोग नहाकर कपड़ा नया कपड़ा पहनकर गांव के ही नाथ बाबा मंदिर पर जाते हैं. जहां से यह फगुआ शुरू होता है. तीन दिनों तक लगातार हर घर जाकर अबीर लिया जाता है. युवा और बूढ़े लोगों को छोड़िए बच्चे भी देखकर सब कुछ सीख लेते हैं.

नौकरी छोड़ आते हैं लोग, घूमने के दौरान गोबर, रंग और पानी के पड़ते हैं छींटेजिस घर में कोई नया विवाह हुआ हो या कुछ ऐसा माहौल हो, उसके हिसाब से बच्चे गाली भी गाते हैं. उसके एवज में उनके ऊपर पानी, रंग, गुलाल या गोबर इत्यादि महिलाओं के द्वारा घोलकर फेंका जाता है. इस माहौल को देखने के लिए लोग किसी भी प्रकार से नौकरी से छुट्टी लेकर फ्लाइट और ट्रेन में भीड़ इत्यादि का सामना करके घर आते हैं.

यह पूरा कवरेज पारी के मुताबित, चौरा गांव निवासी केएन सिंह पिता का नाम रामचंद्र सिंह के यहां आयोजित फगुआ के दौरान हुआ.
Location :Ballia,Ballia,Uttar PradeshFirst Published :March 12, 2025, 12:42 ISThomeuttar-pradeshअनोखी होली! सदियों पुरानी परंपरा, नौकरी छोड़ देखने आते हैं लोग

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