82 साल की उम्र में पद्मश्री डॉ. चूड़ामणि सरोज ने आईआईटी कानपुर से पीएचडी करने का फैसला लिया है। उनका कहना है कि यह केवल एक डिग्री हासिल करने का प्रयास नहीं है, बल्कि उनके जीवन के एक अधूरे सपने को पूरा करने की कोशिश है।
डॉ. सरोज के अनुसार, इस शोध का विचार उन्हें कई दशक पहले आया था। उन्होंने बताया कि वर्ष 1968 में उन्होंने एक सपना देखा था जिसमें एक बच्चा जन्म के बाद अपने पैरों पर चल नहीं पा रहा था। उस दृश्य ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला, तभी उन्होंने तय किया कि वह ऐसे बच्चों के लिए कुछ ऐसा काम करेंगी जिससे भविष्य में उन्हें बेहतर इलाज मिल सके।
सपना बना जीवन का लक्ष्य
डॉ. चूड़ामणि सरोज ने बताया कि उस सपने के बाद से ही उनके मन में यह विचार लगातार बना रहा। समय के साथ उन्होंने चिकित्सा और विज्ञान के क्षेत्र में काम किया, लेकिन यह सपना कभी भूली नहीं। यही कारण है कि 82 साल की उम्र में भी उन्होंने पढ़ाई और शोध को जारी रखने का निर्णय लिया।
उनका कहना है कि जीवन में अगर कोई उद्देश्य स्पष्ट हो तो उम्र कभी बाधा नहीं बनती। वह मानती हैं कि सीखने और शोध करने की कोई उम्र नहीं होती, अगर मन में समाज के लिए कुछ करने का संकल्प हो तो किसी भी उम्र में नई शुरुआत की जा सकती है।
बेहद खास है शोध का विषय
डॉ. सरोज का शोध उन बच्चों और मरीजों से जुड़ा है जो जन्म के बाद शारीरिक रूप से कमजोर होते हैं या चलने-फिरने में सक्षम नहीं होते। उनका उद्देश्य यह समझना है कि ऐसे बच्चों की समस्या को बेहतर तरीके से कैसे समझा जाए और उनके इलाज के नए रास्ते कैसे विकसित किए जाएं।
उन्होंने कहा कि देश में कई ऐसे बच्चे और मरीज हैं जिन्हें सही समय पर उचित इलाज नहीं मिल पाता। अगर इस दिशा में वैज्ञानिक शोध बढ़े तो भविष्य में उनके लिए बेहतर चिकित्सा सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं।
उम्र नहीं, इरादे मायने रखते
डॉ. चूड़ामणि सरोज का मानना है कि समाज में कई लोग उम्र को अपनी सीमाओं का कारण मान लेते हैं। लेकिन अगर किसी के भीतर सीखने और कुछ नया करने की इच्छा हो तो उम्र कभी रुकावट नहीं बनती। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य केवल अपना सपना पूरा करना नहीं है, बल्कि ऐसा शोध करना है जिससे आने वाले समय में जरूरतमंद मरीजों को लाभ मिल सके।
उनका यह प्रयास कई लोगों के लिए प्रेरणा भी बन रहा है कि जीवन में किसी भी उम्र में नई शुरुआत की जा सकती है।

