मेंथा ऑयल की खेती: 90 दिन में मालामाल हो सकते हैं किसान
मेंथा ऑयल की खेती एक लाभदायक व्यवसाय हो सकता है, जिससे किसानों को अच्छा खासा मुनाफा हो सकता है. उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में मेंथा की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. यहां के किसान मेंथा की खेती से कम लागत में अधिक मुनाफा कमा सकते हैं. मेंथा का पौधा औषधीय गुणों वाला एक पौधा है, जिसकी जड़ों में कई पोषक तत्व पाए जाते हैं, जैसे कि ऊर्जा, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, नियासिन, विटामिन ए, विटामिन सी, सोडियम, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम और कैल्शियम आदि.
मेंथा की खेती के लिए मार्च के महीने में रोपाई की जाती है, जून के महीने में तैयार हो जाती है, और उसके बाद किसान बरसात के मौसम में धान की खेती करते हैं. यह फसल 90 दिन में तैयार हो जाती है, और किसानों को इसकी कुछ उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए. कुछ उन्नत किस्में हैं, जैसे कि सिम कोशी, सिम क्रांति, और कुशल, जो क्रमशः 140-150 लीटर, 170-210 लीटर, और 177-194 लीटर तेल प्रति हेक्टेयर प्रदान करती हैं।
मेंथा के पौधों को 45 से 60 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाना चाहिए, जिससे पौधों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके और प्रत्येक पौधे को समान रूप से धूप और हवा प्राप्त हो सके. इससे खरपतवार की समस्या से छुटकारा मिल सकता है. खीरी जिले में तेल निकालने के लिए प्रोसेसिंग यूनिट भी लगी हुई है, जिससे किसान आसानी से मेंथा के पौधों से तेल निकल सकते हैं और आसानी से मेंथा ऑयल तेल की बिक्री कर सकते हैं।
मेंथा का वैज्ञानिक नाम मेंथा आरवैन्सिस है, और इसमें कई पोषक तत्व पाए जाते हैं, जैसे कि ऊर्जा, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, नियासिन, विटामिन ए, विटामिन सी, सोडियम, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम और कैल्शियम आदि. मेंथा की ताजी पत्ती में 0.4 से 0.6 प्रतिशत तेल होता है, और इसमें मेन्थोल भी पाया जाता है, जिसका उपयोग दवाइयों, सौंदर्य प्रसाधनों, पेय पदार्थ, सिगरेट, पान मसाला आदि में किया जाता है. इसके अलावा इसका तेल यूकेलिप्टस के तेल के साथ कई रोगों में काम आता है, और त्वचा पर हो रही लगातार खुजली से छुटकारा पाने के मेन्थाल का तेल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

