Uttar Pradesh

गुलरिया में बसी पारिवारिक एकता और शुभता

फर्रुखाबाद की होली में गुलरिया—गाय के गोबर से बनी छोटी-छोटी आकृतियां—सिर्फ पारंपरिक नहीं, बल्कि परिवार की खुशहाली, बुराई पर अच्छाई की जीत और प्रकृति के प्रति आभार का प्रतीक हैं. होलिका दहन में इन्हें अर्पित करना सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा की कामना का खास रिवाज है.

फर्रुखाबाद. गोबर से तैयार गुलरिया जिसे होलिकाभ कहते हैं, इसके बिना होली का पूजन अधूरा होता है, ऐसे में होली पर गुलरिया गोबर, गाय के गोबर से बनाई गई छोटी-छोटी गोल या विशेष आकृतियां का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व होता है. खासकर उत्तर प्रदेश ग्रामीण अंचल क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी निभाई जाती है.

लोकल18 को पंडित रत्नाकर चतुर्वेदी ने बताया कि होली से पहले जो होलिका दहन किया जाता है, उसमें लकड़ियों के साथ गुलरिया गोबर भी डाली जाती है. मान्यता है कि इससे नकारात्मक ऊर्जा, रोग और अशुभ शक्तियों का नाश होता है. गोबर को हिंदू धर्म में पवित्र माना गया है और इसे देवी-देवताओं की पूजा में भी उपयोग किया जाता है. होलिका दहन में गाय के गोबर से बनी गुलरिया अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है. शास्त्रों में गाय के गोबर को पवित्र और शुद्धिकारक बताया गया है, जब इसे अग्नि में समर्पित किया जाता है तो यह वातावरण की नकारात्मकता को दूर कर परिवार में सुख-समृद्धि लाने का प्रतीक बनता है.

पारिवारिक जुड़ाव का है प्रतीकउनका कहना है कि कई घरों में परिवार के हर सदस्य के नाम से एक-एक गुलरिया बनाई जाती है. इसे अग्नि में डालते समय दीर्घायु, आरोग्य और उन्नति की कामना की जाती है. यह अनुष्ठान बुराई पर अच्छाई की विजय और जीवन से कष्टों के दहन का संदेश देता है. पंडित जी यह भी बताते हैं कि होली नई फसल और नई शुरुआत का पर्व है. ऐसे में गुलरिया गोवर अर्पित करना प्रकृति, गौ माता और अग्नि देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है.

होलिका दहन में विशेष भूमिकाहोलिका दहन के समय गुलरिया गोबर को अग्नि में अर्पित करना शुभ माना जाता है. कुछ स्थानों पर परिवार के प्रत्येक सदस्य के नाम से एक-एक गुलरिया बनाई जाती है और उसे अग्नि में डालकर उनकी लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है.

गाय और गोबर का आध्यात्मिक महत्वहिंदू संस्कृति में गाय को माता का दर्जा दिया गया है, गोबर को शुद्ध और रोगनाशक माना जाता है. गोबर से बनी गुलरिया को अग्नि में समर्पित करना पवित्रता और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक भी है. ग्रामीण इलाकों में यह परंपरा खेती और पशुपालन से भी जुड़ी है. होली के समय नई फसल आने की खुशी में गोबर की गुलरिया बनाकर प्रकृति और पशुधन के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है. गुलरिया बनाने का कार्य महिलाएं और बच्चे मिलकर करते हैं, इससे परिवार में एकता, सहयोग और उत्साह का माहौल बनता है.

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