Uttar Pradesh

केमिकल रंगों को कहें अलविदा, फूलों की खुशबू से सजेगी होली, ये महिलाएं बना रहीं प्राकृतिक गुलाल।

फर्रुखाबाद में महिलाएं बना रही हैं हर्बल गुलाल, स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए एक अच्छा विकल्प

फर्रुखाबाद: होली के त्योहार के अवसर पर बाजार में मिलने वाले विभिन्न प्रकार के केमिकल युक्त रंग और गुलाल त्वचा तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं. ऐसे में फर्रुखाबाद जिले के दीन दयाल बाग की महिलाओं ने एक सराहनीय पहल करते हुए हर्बल गुलाल तैयार करना शुरू किया है. यह पहल न केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी है, बल्कि महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में भी एक मजबूत कदम साबित हो रही है.

महिलाओं ने प्राकृतिक सामग्री का उपयोग करके हर्बल गुलाल तैयार किया है. हरे रंग के लिए पालक और करी पत्ता, पीले रंग के लिए कच्ची हल्दी, नीले रंग के लिए जैस्मिन के फूल, नारंगी रंग के लिए गेंदा के फूल और लाल और गुलाबी रंग के लिए चुकंदर के रस का इस्तेमाल किया जा रहा है. इन सामग्रियों को पहले सुखाया जाता है, फिर पीसकर सुरक्षित तरीके से गुलाल तैयार किया जाता है. इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के रासायनिक तत्व का प्रयोग नहीं किया जाता, जिससे त्वचा, आंखों या श्वसन संबंधी समस्याओं का खतरा नहीं रहता.

महिलाओं ने कम पूंजी से शुरू हुई इस पहल को बढ़ावा देने के लिए काम किया है. फर्रुखाबाद की महिलाएं पिछले कई वर्षों से अलग-अलग स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हुई हैं. कई सदस्य मिलकर इस कार्य को आगे बढ़ा रही हैं. प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने पहली बार बड़े पैमाने पर हर्बल गुलाल का उत्पादन शुरू किया. शुरुआत में समूह की सीमित पूंजी से इस पहल की नींव रखी गई थी, लेकिन अब इनके उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है.

ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ आसपास के बाजारों में भी इन हर्बल रंगों की चर्चा हो रही है. लोग सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल विकल्प को प्राथमिकता दे रहे हैं. इससे महिलाओं को अतिरिक्त आय का अवसर मिल रहा है और वे आत्मनिर्भरता की ओर मजबूती से कदम बढ़ा रही हैं.

महिलाओं ने बताया कि बाजार में मिलने वाले अधिकांश रंग और अबीर में हानिकारक रसायन मिलाए जाते हैं, जो त्वचा रोग, एलर्जी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं. इसके विपरीत, प्राकृतिक और घरेलू सामग्रियों से तैयार हर्बल गुलाल पूरी तरह सुरक्षित विकल्प है. यह पहल पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है, क्योंकि इन रंगों से मिट्टी और पानी को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता.

जिले में तैयार हो रहा यह हर्बल गुलाल केवल होली का रंग नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बन चुका है. गांव की महिलाएं अपने परिश्रम और लगन से यह साबित कर रही हैं कि उचित प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर ग्रामीण महिलाएं भी सफलता की नई कहानी लिख सकती हैं. यह पहल न केवल गांव की तस्वीर बदल रही है, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है.

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