पशुओं के लिए खुरपका-मुंहपका बीमारी घातक, सही डाइट और टीकाकरण से बचाएं जान
पशुओं में होने वाली बीमारी गलघोंटू जिसको “हेमोरेजिक सेप्टिसीमिया” के नाम से जाना जाता है. जिसमे पेस्टुरेला मल्टीओसिडा विशेष रूप से B2 या E2 सीरोटाइप नामक जीवाणु से होने वाला एक तीव्र और अत्यधिक घातक रोग है जो मुख्य रूप से गाय, भैस को प्रभावित करता है. जिसमे पशुओं को तेज बुखार गले में गंभीर सूजन और 1 से 2 दिनों के भीतर उपचार ना मिलने पर तेजी से मृत्यु हो जाती है. इसके प्रमुख लक्षण की बात करे तो यह रोग गंभीर आर्थिक नुकसान पहुंचाता है और अक्सर मानसून के मौसम में चरम पर पहुंचता है.
गर्मियों का सीजन आते ही पशुओं में तरह-तरह की बीमारियां होने लगती है. खासकर यह बीमारियां बरसात से पहले पशुओं को लग जाती है. जैसे गलघोंटू, खुरपका, मुंहपका जो की वायरल डिजीज होता है. इसमें पशुओं को 104 से 105 डिग्री तक बुखार आ जाता है. जिसको लेकर पशुपालक बीमारी आने से पहले ही कर लें यह काम. नहीं होंगे पशु बीमार बनी रहेंगी दूध देने की छमता.
पशुओं में अधिक देखी जाने वाली बीमारीपशुओं में ज्यादातर खुरपका और मुंहपका बीमारी देखी जाती है. जिसमें पशुओं के पैर के नीचे घाव छाले हो जाते है और मुंह के अंदर भी घाव हो जाता है. जिससे पशु चारा नहीं खा पाते है और बुखार भी उनका लगभग 104 से 105 डिग्री तक पहुंच जाता है. इस बीमारी से पशुओं की दूध देने की क्षमता भी घट जाती है और इसमें समय रहते पशुपालकों को वैक्सीनेशन की आवश्यकता होती है. भारत सरकार भी अभियान चलाकर समय-समय पर वैक्सीनेशन साल में दो बार पशुओं में करती है. ज्यादातर केस में डॉक्टर 4 से 5 दिन इलाज करके इस बीमारी को नियंत्रित कर लेते है.
खुरपका, मुंहपका से बचाव के उपायइस बीमारी का सीधा नाता पशुओं की इम्युनिटी शक्ति से है क्योंकि इम्युनिटी शक्ति कमजोर होने पर पशुओं को या बीमारी जल्दी लगती है. इसलिए पशुपालकों को अपने पशुओं को अच्छी डाइट देनी चाहिए. खासकर, कैल्शियम, विटामिन-ई, सेलेनियम, जैसी डाइट यह डाइट पाने वाले पशुओं पर या बीमारी जल्दी अटैक नहीं करती. जो पशुपालक हमारे पशुओं की डाइट में इन विटामिनों को इंक्लूड करते है उनके पशुओं को यह बीमारी नहीं काफी हद तक नही लगती है.
ऐसे करें बचाव और उपचारबहराइच जिले के चितौरा ब्लॉक में तैनात पशु चिकित्सक डॉक्टर कुलदीप कुमार ने बताया कि एंटीबायोटिक्स जैसे टेट्रासाइक्लिन, सल्फोनामाइड तभी प्रभावी होते है. जब उन्हें रोग के बहुत पहले चरणों में दिया जाता है. ऐसे करे नियंत्रण पशुओं की आवाजाही को सीमित करना और बीमार पशुओं को अलग रखना संक्रमण को फैलने से रोकने में काफी हद तक मददगार साबित होता है. इन बातों का ध्यान रख कर बीमारी को काफी हद तक सीमित किया जा सकता है.

