वाराणसी में मसाने की होली पर विवाद, काशी विद्वत परिषद ने अशास्त्रीय परम्परा का विरोध किया
वाराणसी। काशी के महाश्मशान घाट पर चिता भस्म की होली मनाई जाती है, जिसे मसाने की होली कहा जाता है। यह होली रंगभरी एकादशी और उसके अगले दिन हरिश्चंद्र और मणिकर्णिका घाट पर खेली जाती है। लेकिन इस होली पर अब विवाद खड़ा हो गया है। काशी विद्वत परिषद ने इसके खिलाफ आवाज उठाई है और इसे अशास्त्रीय परम्परा बताया है।
बीएचयू के ज्योतिष विभाग के हेड और विद्वत परिषद से जुड़े विद्वान पंडित विनय पाण्डेय ने बताया कि महाश्मशान में मसाने की होली शास्त्र सम्मत परंपरा नहीं है। उन्होंने कहा कि बीते कुछ वर्षों से शुरू हुई इस परंपरा को अब प्राचीन बताकर प्रचारित किया जा रहा है, जबकि इसके धार्मिक आधार पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि महाश्मशान भगवान शिव का स्थान है, जहां भगवान शिव नृत्य करते हैं। ऐसे में उस जगह पर होली खेलकर उत्सव मनाना पूरी तरह से गलत है। क्योंकि किसी भी मनुष्य में भगवान शिव के समान सामर्थ्य नहीं है। इसलिए ऐसे अशास्त्रीय परम्परा वाली होली का काशी विद्वत परिषद विरोध करती है।
पंडित पाण्डेय ने आगे कहा कि जल्द ही विद्वानों की बैठक कर इस संबंध में एक पत्र भी जारी किया जाएगा और उसे प्रशासन को सौंप इस पर रोक लगाने की बात मांग उठाई जाएगी। उन्होंने कहा कि महाश्मशान की एक मर्यादा है, यह जगह उत्सव मनाने की जगह नहीं है। वह भी इस प्रकार का उत्सव जिसमें युवक, युवतियां और अन्य लोग परम्परा के नाम पर काशी के मर्यादा को तार-तार करतें है।
काशी विद्वत परिषद ने इस परंपरा का मुखर विरोध अब कर रही है। उन्होंने कहा कि इस होली में भगवान शिव के गढ़ और औगढ़ शामिल होतें है, लेकिन बदलते दौर में इस होली में बड़ी संख्या में युवक युवतियां भी शामिल होती है। धार्मिक मान्यता है कि इस मसाने की होली में भगवान शिव खुद अदृश्य रूप में अपने गढ़ों के साथ होली खेलने यहां आते हैं।
काशी विद्वत परिषद ने इस परंपरा को अशास्त्रीय बताया है और जल्द ही विद्वानों की बैठक कर इस संबंध में एक पत्र भी जारी किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस परंपरा को प्राचीन बताकर प्रचारित किया जा रहा है, जबकि इसके धार्मिक आधार पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं।

