Uttar Pradesh

बच्चों के डॉक्टर बनने की आकांक्षा को संजोने वाले मासूमों का दर्द, लाल ईंट के भट्टों में उनके सपने दफन हो रहे हैं, उन्होंने कहा- ‘हमारे पास पैसा नहीं है’

कौशांबी: बच्चों का भविष्य दफन होता दिख रहा है ईंट भट्ठों में

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के सिराथू तहसील अंतर्गत गनपा में 555 शीतल नाम से ईंट संचालित भट्ठे में छोटे मासूम बच्चों का भविष्य दफन होते देखने को मिल रहा है. जब मौके पर Local 18 की टीम ने मासूम बच्चों से पूछा, तो एक बच्चे ने कहा कि डॉक्टर बनने का सपना है, लेकिन हाथों में किताब की जगह ईंट का गारा थामना पड़ा. कौशांबी जिले से ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सिस्टम और समाज दोनों से सवाल पूछती है.

मजदूर परिवार साथ लेकर चलते हैं

मासूम बच्चे तो पढ़ना चाह रहे हैं, लेकिन उनकी मजबूरी उन्हें पढ़ने नहीं देती है, क्योंकि यह मजदूर लोग अपना घर और प्रदेश छोड़कर अपने रोजी-रोटी के लिए निकलते हैं. साथ में अपने बीवी-बच्चों को लेकर चलते हैं, क्योंकि उन लोगों का काम कच्ची ईंट बनाने का होता है. अगर वह घर से बाहर निकलते हैं, तो अपने बच्चों को किसी के सहारे तो छोड़ नहीं सकते हैं. इसलिए वह अपने साथ परिवार लेकर चलते हैं.

कुछ पैसों की मजबूरी होने के कारण इन परिवारों के बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं. इसलिए वह अपने माता-पिता के साथ काम में लगे रहते हैं. यही वजह है कि मासूम बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं, लेकिन अगर बच्चों के लिए भट्ठे में टीचर की सुविधा दे दी जाए, तो वह काम करने के बजाय पढ़ाई-लिखाई शुरू कर देंगे. लेकिन उनका यह भी एक सवाल होता है कि उनके पास इतना पैसा कहां से आए कि वह केवल भट्टे में पढ़ाने के लिए टीचर को बुला पाएं.

ईंट-भट्ठों पर सुबह से शाम तक मेहनत

मजदूर दिन-रात मेहनत करके भट्ठा मालिकों को करोड़ों की कमाई कराते हैं, लेकिन उन्हीं मजदूरों के बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं. क्या करोड़ों के मुनाफे में से थोड़ी-सी रकम बच्चों की पढ़ाई पर खर्च नहीं की जा सकती. ईंट-भट्ठों पर सुबह से लेकर देर शाम तक मजदूरों की कड़ी मेहनत से लाखों ईंटें तैयार होती हैं. यही ईंटें शहरों की ऊंची इमारतों की नींव बनती हैं और भट्ठा मालिकों के लिए करोड़ों की कमाई का जरिया भी होता है.

मजदूरों के बच्चे आज भी शिक्षा से दूर

अब सवाल यह है कि जिन हाथों से यह सपनों की इमारतें बनती हैं, क्या उन हाथों के अपने सपने पूरे हो पा रहे हैं. मजदूरों के बच्चे आज भी शिक्षा से दूर हैं. जहां एक ओर मालिकों के कारोबार में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, वहीं दूसरी ओर मजदूरों के बच्चे किताब और स्कूल से कोसों दूर हैं. कई बच्चे तो छोटी उम्र में ही माता-पिता के साथ काम में हाथ बंटाने लगते हैं.

अगर भट्ठा मालिक चाहें, तो अपने मुनाफे का एक छोटा सा हिस्सा निकालकर भट्ठे पर ही एक शिक्षक की व्यवस्था कर सकते हैं. इससे न सिर्फ बच्चों का भविष्य सुधरेगा, बल्कि समाज को भी एक शिक्षित पीढ़ी मिलेगी.

मजदूरी छीन रही बच्चों का भविष्य

मजदूर के बच्चों ने कहा कि पढ़ने का मन तो है, लेकिन टीचर की सुविधा नहीं है. इसलिए हम पढ़ नहीं पा रहे हैं, क्योंकि हमारा भी सपना डॉक्टर बनने का है और जिससे लोगों की सेवा करें, लेकिन हमारे सामने मजबूरी है कि यहां टीचर नहीं है.

मजदूर राजेंद्र कुमार ने कहा कि रोजी-रोटी चलाने के लिए घर से दूर निकलते हैं और काम भी ऐसा होता है कि अकेले करना संभव होता है. इसलिए जहां भी जाते हैं, घर-परिवार को साथ लेकर जाते हैं और बच्चों को न पढ़ने की सबसे बड़ी मजबूरी है कि अधिक पैसा ना होने के कारण बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं पाते हैं.

इस पूरे मामले में सवाल यह है कि क्या हमारे समाज में शिक्षा का महत्व है या नहीं. अगर है तो फिर क्यों मजदूरों के बच्चे शिक्षा से वंचित हो रहे हैं. यह सवाल हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारे समाज में शिक्षा का महत्व है या नहीं.

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