Uttar Pradesh

जिनकी तलवार की धार के आगे मुगल और नवाब भी नतमस्तक हुए, शौर्य से भरी है अमेठी के इस प्रतापी राजा की कहानी

अमेठी: उत्तर प्रदेश का अमेठी जिला केवल राजनीति का केंद्र ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का धनी भी है. यहां दो प्रमुख पहचान हैं संत पीठ और राज पीठ. संत पीठ के रूप में टीकरमाफी आश्रम का विशेष स्थान है, जबकि राज पीठ की बात करें, तो अमेठी का राजमहल इस गौरव को परिभाषित करता है.

आज हम आपको ऐसे प्रतापी राजा की कहानी बताने जा रहे हैं, जिनकी तलवार की धार के आगे मुगल और नवाब भी घुटने टेकतें नजर आए. उन्होंने एक बेहतर कुशल शासक के साथ-साथ इतिहास के पन्नों में भी अमेठी का नाम विश्व पटल पर पहुंचाया. आइए इतिहासकार से समझते हैं प्रतापी राजा गुरुदत्त सिंह की कहानी.

अवध और मुगल के नवाब भी हुए ढ़ेर 

इतिहासकारों के अनुसार, अमेठी की रियासत की स्थापना लगभग 1000 वर्ष पूर्व हुई थी. अमेठी रियासत की स्थापना करने वाले प्रतापी राजा गुरु दत्त सिंह ने इस राजवंश की नींव रखी थी. समय के साथ कई राजाओं ने इस रियासत को नेतृत्व दिया, जिनमें लाल माधव सिंह, राजा भगवान भगत सिंह, विश्वेश्वर सिंह, रंजय सिंह जैसे नाम शामिल हैं. वर्तमान में राजा संजय सिंह इस ऐतिहासिक विरासत के उत्तराधिकारी हैं. गुरु दत्त सिंह इतने प्रतापी राजा थे, जिनकी तलवार की धार के आगे मुगल और अवध के नवाब भी नहीं टिक सके.

इतिहास के पन्नों में अमेठी रियासत का नाम केवल एक राजनीतिक केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि शौर्य और साहित्य के संगम के रूप में दर्ज है. इस गौरवगाथा के सबसे चमकते सितारे थे राजा गुरुदत्त सिंह, जिन्हें दुनिया ‘भूपति’ के नाम से जानती है. वे न केवल एक महान योद्धा थे, बल्कि हिंदी साहित्य के एक महान कवि भी थे.

राज परिवार के आगे धराशाही हुए मुगल और नवाब

राज परिवार के कवि और इतिहासकार राजेंद्र शुक्ला अमरेश बताते हैं कि अमेठी का गौरवशाली इतिहास राजाओं की धरती और सूफी संतों की तपोभूमि के लिए जाना जाता है. उन्होंने कहा कि जब भरो ने अमेठी के साथ अयोध्या पर कब्जा करने के लिए महाराज गुरु दत्त सिंह पर हमला किया, तब उन्होंने अपनी सेना के साथ उनका सामना किया और राजा गुरुदत्त सिंह के आगे अवध के शक्तिशाली नवाब सआदत अली खां भी नहीं टिक सके और उन्हें भी पराजय का सामना करना पड़ा. राज परिवार के आगे आखिरकार मुगल और नवाब भी पराजित हो गए.

उन्होंने कहा कि राजा ने अपना साम्राज्य सुरक्षित करने और अयोध्या के मठ मंदिरों की रक्षा के लिए. नवाब की विशाल सेना से भीषण युद्ध किया और उन्होंने नवाब को पराजित कर पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. उनकी वीरता की कहानी को तत्कालीन कवि कवीन्द्र ने भी अपनी पंक्तियों के लाइनों में आज भी इतिहास के पन्ने में संजोकर रखा है, जिनकी किताबें आज भी राजश्री रणन्जय विद्यालय की पुस्तकालय में मिलेगी.

कुशल शासक के साथ साहित्य के भी धनी

1741 में राजपाठ संभालने वाले कुशल शासक के रूप में फेमस राजा गुरुदत्त सिंह न सिर्फ एक बेहतर राजा थे, बल्कि साहित्य के भी धनी थे. उन्होंने अपनी लेखनी में सबसे प्रसिद्ध कृति ‘भूपति सतसई’ की रचना की. इसके साथ ही उन्होंने कण्ठाभरण रसरत्नाकर’ और ‘रस-रत्नावली’ जैसे महत्वपूर्ण रीति-ग्रंथों को भी अपने काव्य कलाकृति में शामिल करते हुए उसे भी इतिहास के पन्नों में दर्ज किया.

आज भी चमचमाता है रामनगर का राजमहल

अमेठी के प्रतापी राजा कहे जाने वाले राजा गुरुदत्त सिंह ने इतिहास के अमिट छाप में अमेठी के राजमहल की स्थापना की. अमेठी के करीब 3 किलोमीटर दूर रामनगर में आज भी भूपति भवन महल का स्थान राजश्री वैभव और पुरानी सभ्यता संस्कृति की गवाही देता है और विरासत की प्रेरणा के रूप में जाना जाता है.

Source link

You Missed

Scroll to Top