मिर्जापुर. भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते का ऐलान हो गया है, यूरोपीय संघ के सदस्य देशों और भारत सरकार ने इसका ऐलान कर दिया है. फ्री ट्रेड एग्रीमेंट होने के बाद मिर्जापुर के कालीन व्यवसाइयों की उम्मीदें बढ़ गई हैं. अमेरिका के साथ तनातनी के बाद प्रभावित हुए व्यवसाय घाटे को खत्म करने के लिए यूरोप नई संजीवनी के रूप में नजर आ रहा है.
कालीन के व्यवसायी ने कहा कि यूरोपीय संघ के साथ जो फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ है, वह जल्द से जल्द लागू होना चाहिए. जिस तरह से यूके के साथ ट्रेड एग्रीमेंट होने के बाद वह लागू हो गया, उसी तरह अगर यूरोप के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट होता है तो निश्चित तौर पर भारत को नई संजीवनी मिलेगी. इसके साथ ही 200 करोड़ रुपये का कालीन कारोबार बढ़ने की संभावना है.
कालीन के व्यवसायी विक्रम जैन ने लोकल 18 से बताया कि अगर ईयू (EU) द्वारा भारत से व्यापार समझौता होता है तो इससे काफी फायदा होगा. जो भी हम सामान एक्सपोर्ट करते हैं, चाहे वह कालीन ही क्यों न हो, हर देश में इस समय अलग-अलग कस्टम ड्यूटी लगती है. अभी यदि कालीन फ्रांस जाती है तो 15 से 22 प्रतिशत तक कस्टम ड्यूटी लगती है. अगर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हो जाता है तो इम्पोर्ट ड्यूटी नहीं देनी पड़ेगी और बायर्स को फायदा होगा, जिससे ज्यादा से ज्यादा ऑर्डर मिलेंगे. अमेरिकी टैरिफ के बाद जिस तरह से कारोबार प्रभावित हुआ है, अगर यूरोपीय यूनियन के साथ ट्रेड डील फाइनल होती है तो निश्चित तौर पर बड़ा फायदा भारत को और खासकर कालीन के व्यवसायियों को होगा.
15 से 18 महीने का समय लग सकता है
विक्रम जैन ने बताया कि यूरोपीय संघ के जो भी सदस्य इसमें शामिल थे, उन्होंने सकारात्मक भूमिका निभाई और अप्रोच को पॉजिटिव रखा. मगर इसे लागू होने में 15 से 18 महीने का समय लगेगा क्योंकि संघ इस प्रस्ताव को अपने संसद में रखेगा. उसके बाद 27 देशों की सहमति लेनी होगी और फिर यह लागू होगा. सबकुछ ठीक रहा तो अगले एक से डेढ़ सालों में इसका फायदा दिखना शुरू हो जाएगा.
बायर्स को मिलेगी सुविधा
विक्रम जैन ने बताया कि अगर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट होता है, तो इम्पोर्ट करने वाले बायर्स को काफी सुविधा होगी और ज्यादा से ज्यादा ऑर्डर आएंगे. एक बार पैसे देने के बाद दोबारा पैसे नहीं देने होंगे, इससे व्यवसाय में वृद्धि होगी. यूरोप के फ्रांस, डेनमार्क, नीदरलैंड और जर्मनी आदि देशों में कालीन निर्यात हो रहे हैं. इन जगहों पर भारतीय कालीन की मांग अधिक है, यहां पर ठंड अधिक रहती है, इसलिए ऊन की जरूरत हमेशा रहती है और मांग बनी रहती है.
फ्रांस, डेनमार्क और नीदरलैंड में होती है सप्लाई
विक्रम जैन ने बताया कि यूरोप में छोटे-छोटे देश हैं और वहां घरों के साइज भी छोटे होते हैं. ऐसे में जो कॉर्पोरेट एक्सपोर्ट होते हैं, वह 58 और 810 के साइज के होते हैं. क्वांटिटी कम होती है. वहीं, अगर कालीन अमेरिका जाती है तो 810, 912 और 9*14 जैसे बड़े साइज की डिमांड रहती है. वहां पर कालीन बल्क में जाते हैं तो फायदा ज्यादा होता है. उनके घर भी बड़े होते हैं, इसलिए साइज बढ़ जाती है. अभी भी 70 प्रतिशत बाजार अमेरिका का है और 30 प्रतिशत व्यवसाय यूरोप के साथ है. अगर अमेरिका के साथ भी कोई बातचीत होती है तो इससे भारत को और ज्यादा फायदा होगा.

