बलिया: अब स्वयं सहायता समूह ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता की मिसाल साबित हो रही है. बात अगर बलिया की करें, तो यहां लगातार महिलाएं आगे बढ़ रही हैं. जनपद में समूह की अनेक महिलाएं हर किसी के लिए प्रेरक कहानी लिख रही हैं. उनमें से एक हैं सोनी देवी और उनके साथ जुड़ी महिलाएं, जो मेहनत, हुनर और लगन से अपनी पहचान बना रही हैं.
लगभग 5 साल पहले डूडा विभाग से जुड़कर इन महिलाओं ने स्वयं सहायता समूह की शुरुआत की. शुरू के दिनों में इन्होंने अचार निर्माण की परियोजना तैयार की और लगातार प्रयास और मेहनत से अपने काम को विस्तृत बना दिया है.
अब तक समूह से जुड़ी 10 महिलाएं
स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष सोनी देवी ने कहा, आज इस समूह से 10 महिलाएं जुड़ चुकी हैं, जो आपस में मिलकर विभिन्न प्रकार के केमिकल फ्री और पारंपरिक अचार तैयार करती हैं. इनमें सुरन, मिर्च, मिक्स अचार, कटहल, आम, नींबू, मूली और गाजर जैसे स्वादिष्ट अचार शामिल हैं. खास बात यह है कि, ये सभी अचार महिलाएं अपने घरों में खुद अपने हाथों पारंपरिक तरीकों से बनाती हैं, जिससे गुणवत्ता और स्वाद दोनों दमदार होता है.
बदल रही महिलाओं की जिंदगी
समूह से जुड़ने के बाद इन महिलाओं की जिंदगी में बड़ा बदलाव आया है. पहले जहां समय यूं ही निकल जाता था, अब उसी समय का सही उपयोग कर ये महिलाएं अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं. अचार बनाने में लगने वाली सामग्री बाजार से खरीदी जाती है और बिके हुए अचार से ही अगली सामग्री की व्यवस्था भी हो जाती है. इसके अलावा, समूह के माध्यम से महिलाओं को लोन की सुविधा भी मिलती है, जिससे वे अन्य छोटे व्यवसाय भी शुरू कर सकें और कमाई होने पर प्रतिपूर्ति कर दें.
महिलाओं को दे रहीं ट्रेनिंग
उन्होंने आगे कि समूह से जुड़ने से पहले वे सिलाई का काम करती थीं, लेकिन स्वयं सहायता समूह से जुड़ना बहुत अच्छा रहा. वहीं समूह से जुड़ी दुबहड़ ब्लॉक के ग्राम संगठन अखार की अध्यक्ष कृष्णा चौधरी के अनुसार, वह अचार बनाने के साथ अन्य महिलाओं को ट्रेनिंग भी देती हैं. इनसे प्रशिक्षण लेकर कई महिलाएं आत्मनिर्भर बन चुकी हैं.
बराबर हिस्सों में बांटती हैं मुनाफा
सरकार की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की यह पहल वास्तव में सफल साबित हो रही है. यह समूह न केवल रोजगार दे रहा है, बल्कि महिलाओं को आत्मविश्वास, सम्मान और एक नई पहचान भी प्रदान कर रहा है. इसमें जो भी मुनाफा होता है, उसे बराबर-बराबर हिस्सों में बांटा जाता है. महिलाएं चाहती हैं कि सरकार उन्हें एक स्थायी बाजार उपलब्ध कराए, जिससे वे अपने उत्पाद स्थानीय लोगों तक आसानी से पहुंचा सकें, जो रोजगार को काफी बढ़ावा दे सकता है.

