Uttar Pradesh

मोहब्बत की वो इबादत, जिसे वक्त भी न मिटा सका, 11 साल पहले दुनिया छोड़ गए ‘बुलंदशहर के शाहजहां’ की अनकही दास्तां

Bulandshahr Mini Taj Mahal: कहते हैं मोहब्बत जब परवान चढ़ती है, तो वह इतिहास लिख देती है. सदियों पहले शाहजहां ने मुमताज के लिए आगरा में यमुना किनारे सफेद संगमरमर की एक ऐसी इबारत लिखी थी, जिसे दुनिया ने ‘ताजमहल’ कहा. लेकिन आज के दौर में, जब रिश्ते चंद रुपयों की भेंट चढ़ जाते हैं, उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक और ‘शाहजहां’ अपनी बेगम के लिए मोहब्बत का महल खड़ा किया.

यह कहानी है बुलंदशहर के डिबाई इलाके के गांव कसेर कला के रहने वाले 85 वर्षीय फैजुल हसन कादरी की. कादरी साहब ने अपनी मरहूम (दिवंगत) बेगम तज्जमुली की याद में एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसे देखने के लिए आज सात समंदर पार से भी लोग खिंचे चले आते हैं.

बेऔलाद होने का गम और वो आखिरी वादारिटायर्ड पोस्टमास्टर फैजुल हसन कादरी और उनकी बेगम तज्जमुली की कोई औलाद नहीं थी. अक्सर उनकी बेगम इस बात को लेकर उदास रहती थीं कि उनके जाने के बाद दुनिया में उन्हें याद रखने वाला कोई नहीं होगा. अपनी पत्नी की आंखों में ये डर देखकर कादरी ने उनसे वादा किया था ‘तुम फिक्र न करो, मैं तुम्हारी याद में ऐसी इमारत बनवाऊंगा कि दुनिया तुम्हें हमेशा याद रखेगी.’

साल 2011 में तज्जमुली बेगम का इंतकाल हो गया. पत्नी के जाने के गम ने कादरी को अंदर से तोड़ दिया, लेकिन उन्हें अपना वो वादा याद था. फरवरी 2012 में उन्होंने अपने घर से सटे खेत में ही ‘मिनी ताजमहल’ का निर्माण शुरू करा दिया.

गाढ़ी कमाई और पेंशन की पाई-पाई की कुर्बानकादरी साहब ने इस मकबरे को बिल्कुल ताजमहल की शक्ल देने की कोशिश की है. इसे बनवाने में उन्होंने अपनी जीवन भर की जमापूंजी करीब 23 लाख रुपये खर्च कर दिए. यहां तक कि उन्होंने अपनी पत्नी के जेवर और कुछ ज़मीन भी बेच दी ताकि प्यार की इस निशानी में कोई कमी न रहे. हालांकि, ढांचा तो बनकर तैयार हो गया, लेकिन जब बारी इसे संगमरमर से सजाने की आई, तो कादरी के पास पैसे खत्म हो गए थे. पर उन्होंने हार नहीं मानी.

खुद मुफलिसी (गरीबी) में रहकर अपनी 10000 रुपये की मासिक पेंशन का करीब 70 फीसदी हिस्सा बचाकर उन्होंने ताजमहल को पूरा कर दिया था. लेकिन, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. जैसे ही मिनी ताजमहल बनकर पूरा हुआ, वैसे ही 81 साल की उम्र में रिटायर्ड पोस्टमास्टर फैजुल हसन कादरी की मौत एक रोड एक्सीडेंट में हो गई और वो दुनिया छोड़कर चले गए.

वक्फ बोर्ड को सौंपी जिम्मेदारी, शर्त है खासकादरी साहब ने अपनी दूरदर्शिता दिखाते हुए इस ताजमहल और उससे जुड़ी 6 बीघा जमीन को सुन्नी वक्फ बोर्ड के नाम कर दिया था. उन्होंने एक शपथ पत्र के जरिए इसे रजिस्टर्ड कराया था. उनकी शर्त बस इतनी थी कि उनके इंतकाल के बाद वक्फ बोर्ड इसकी हिफाजत करेगा. स्वाभिमानी कादरी ने यह भी साफ कहा था कि वो इसके निर्माण के लिए किसी भी व्यक्ति से निजी आर्थिक सहयोग नहीं लेंगे.

मोहब्बत की गजलों में कैद है तज्जमुली का चेहराकादरी साहब सिर्फ एक इमारत ही नहीं बनाई, बल्कि वह शब्दों के भी धनी थे. उन्होंने अपनी बेगम की याद में उर्दू, हिंदी और फारसी में 450 से ज्यादा गजलें लिखी, जो आज भी मशहूर है. उनकी एक मशहूर गजल की चंद पंक्तियां कुछ इस तरह हैं:

न ये शीशमहल है न कोई ताजमहल,है यादगार-ए-मुहब्बत..ये प्यार का है महल…यहां पर चैन से सोया है दिलनशीं मेरा,उड़ाके लायी है गुलशन से मेरा फूल अजर…

पर्यटन और रोजगार की नई उम्मीदबुलंदशहर का यह मिनी ताजमहल अब सोशल मीडिया और खबरों के जरिए दुनिया भर में मशहूर हो चुका है. यहां सैलानियों और विदेशी पत्रकारों का तांता लगा रहता है. स्थानीय फोटोग्राफर बिट्टू ठाकुर बताते हैं कि यहां आने वाले लोग गुंबद को छूते हुए फोटो खिंचवाने की डिमांड करते हैं. अगर सरकार और प्रशासन इस ओर ध्यान दे, तो यह स्थान इलाके के लिए रोजगार का बड़ा केंद्र बन सकता है.

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