गाजीपुर: उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसे सुनकर आपका कलेजा कांप जाएगा. यहां के करीब एक दर्जन गांवों (हरिहरपुर, फतेहुल्लहपुर, शिकारपुर समेत अन्य) में एक रहस्यमयी बीमारी ने सैकड़ों परिवारों की खुशियां छीन ली हैं. हरिहरपुर, फतेहुल्लहपुर, शिकारपुर, अगस्ता, भोरहा, तारडीह और आसपास के इलाकों में कई परिवारों का दावा है कि उनके बच्चे जन्म के समय स्वस्थ थे, लेकिन 2 से 5 साल की उम्र के बीच तेज बुखार के बाद मानसिक या शारीरिक रूप से दिव्यांग हो गए. मंजर ऐसा है कि कहीं मासूमों को जंजीरों से बांधकर रखा गया है, तो कहीं जवान होती बेटियां बिस्तर पर बेबस पड़ी हैं.
हंसते-खेलते बच्चों को निगल रहा है बुखारकहानी लगभग हर घर में एक जैसी है. बच्चा जन्म के समय बिल्कुल तंदुरुस्त होता है. 3 से 5 साल की उम्र तक वह दौड़ता-खेलता है, लेकिन फिर अचानक आता है ‘तेज बुखार’. इसके बाद शरीर ऐंठने लगता है, आंखें पथरा जाती हैं और कुछ ही दिनों में उस बच्चे का मानसिक और शारीरिक विकास हमेशा के लिए रुक जाता है. कोई बोल नहीं पाता, तो कोई चल नहीं पाता. आलम यह है कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले इन परिवारों के पास अब सिवाय आंसू के कुछ नहीं बचा.
जंजीरों में जकड़ा बचपन, माता-पिता मजबूरगाजीपुर के इन गांवों की हकीकत डरावनी है. लोकल 18 की टीम जब बहादीपुर पहुंची, तो कई माता-पिता ने रोते हुए बताया कि उनके बच्चे मानसिक संतुलन खो चुके हैं. वे कहीं भाग न जाएं या खुद को चोट न पहुंचा लें, इसलिए उन्हें रस्सी या जंजीर से बांधकर रखा जाता है. एक घर में तो तीन-तीन सदस्य इस दिव्यांगता का शिकार हैं. इलाज के लिए वाराणसी से दिल्ली तक की खाक छानी गई, लेकिन बीमारी क्या है, यह आज भी एक राज बना हुआ है.
राजभवन तक पहुंची गूंजइस बड़े खतरे को दुनिया के सामने लाए समाजसेवी सिद्धार्थ राय. लोकल 18 से बात करते उन्होंने बताया “एक मुट्ठी अनाज” अभियान के दौरान जब वे इन गांवों में पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि हर चौथे घर में एक बच्चा दिव्यांग है. 2013 में देश को ‘पोलियो मुक्त’ घोषित किया जा चुका है, (वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन के मुताबिक)फिर ये क्या है? सिद्धार्थ राय ने 8 जनवरी को राज्यपाल से मुलाकात की, जिसके बाद राजभवन के आदेश पर अब जिला प्रशासन की नींद टूटी है.
पानी में जहर है या हवा में बीमारीजिलाधिकारी के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग की टीमें अब गांवों में खाक छान रही हैं. बच्चों के ब्लड सैंपल लिए जा रहे हैं. अधिकारी जांच कर रहे हैं कि क्या यह कोई जेनेटिक समस्या है, या फिर इलाके के पानी और प्रदूषण में कोई ऐसी चीज है, जो बच्चों के दिमाग पर सीधा हमला कर रही है. रिपोर्ट आने में 1-2 हफ्ते लगेंगे, तब तक ये गांव खौफ के साये में जीने को मजबूर हैं. सवाल यह है कि दशकों से यह सिलसिला चल रहा है. गांव के गांव दिव्यांग हो रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग को भनक तक क्यों नहीं लगी? क्या प्रशासन को जगाने के लिए हमेशा किसी अभियान या राजभवन के हस्तक्षेप की जरूरत पड़ेगी.

