Uttar Pradesh

इस्लाम में इस रात को लिखी जाती है जिंदगी और मौत? जानिए क्या होता है ऐसा जो बनता है तकदीर का फैसला

Last Updated:January 18, 2026, 09:26 ISTShab-e-Barat 2026: अलीगढ़ के शाही चीफ मुफ्ती मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने शब-ए-बारात की धार्मिक महत्ता पर प्रकाश डाला है. शाबान महीने की 15वीं रात को मनाई जाने वाली यह रात ‘फैसले की रात’ कहलाती है, जिसमें अल्लाह बंदों की उम्र, मौत और रिज़्क़ जैसे अहम फैसले करता है. इबादत और तौबा के इस पर्व पर मुसलमान अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं और आने वाले साल के लिए रहमत की दुआ करते हैं.Shab-E-Barat 2026: इस्लामिक कैलेंडर का पवित्र ‘शाबान’ महीना अपने साथ रहमतों और बरकतों की वह रात लेकर आता है, जिसका मुंतजिर हर मोमिन रहता है.शब-ए-बारात, जिसे ‘मगफिरत (माफी) और फैसले की रात’ कहा जाता है, न केवल इबादत का अवसर है, बल्कि यह इंसान की तकदीर के नए पन्ने लिखे जाने का समय भी है. अलीगढ़ के शाही चीफ मुफ्ती मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन के अनुसार, यह रात अल्लाह की बेपनाह रहमतों और बंदों की सच्ची तौबा के बीच का एक मुकद्दस सेतु है.

शाबान की 15वीं रात, रहमत और मगफिरत का पैगामइस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, शाबान का महीना मुस्लिम समाज में विशेष स्थान रखता है. इसी महीने की 15वीं रात को ‘शब-ए-बारात’ मनाई जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह वह रात है जब अल्लाह अपने बंदों के लिए आने वाले साल के महत्वपूर्ण फैसले फरमाता है. इसे तौबा और इबादत की रात कहा गया है, जिसमें मुसलमान अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं और एक नेक व बेहतर भविष्य की दुआ करते हैं.

‘फैसले की रात’ की हकीकतउत्तर प्रदेश के शाही चीफ मुफ्ती मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन जानकारी देते हुए बताते हैं कि शब-ए-बारात इस्लाम में एक अत्यंत गरिमामयी और बरकत वाली रात है. यह रात रमज़ान के मुकद्दस महीने से करीब 14-15 दिन पहले आती है. मुफ्ती साहब के अनुसार, इस्लामी मान्यताओं में इसे ‘इंसानों के भाग्य के निर्धारण की रात’ माना गया है. आने वाले साल में इंसान की जिंदगी, मौत, उम्र और तकदीर से जुड़े तमाम मामले इसी रात ईश्वरीय आदेश से तय किए जाते हैं.

तौबा और इबादत का विशेष महत्वमौलाना साहब का कहना है कि इस रात अल्लाह ताला अपने बंदों को तौबा (पश्चाताप) का बेहतरीन अवसर प्रदान करता है. लोग रात भर जागकर नफ़्ल नमाज़ें पढ़ते हैं, कुरआन की तिलावत करते हैं और अल्लाह की जिक्र में मशगूल रहते हैं. इस रात की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि इसमें आगामी वर्ष की ‘रोजी-रोटी’ (रिज़्क़) और जीवन की घटनाओं का लेखा-जोखा तैयार होता है.

इंसानी तकदीर और सामाजिक सरोकारशब-ए-बारात केवल व्यक्तिगत इबादत तक सीमित नहीं है. इस रात मुसलमान न केवल अपने लिए दुआ करते हैं, बल्कि पूर्वजों की कब्रों पर जाकर उनके लिए भी मगफिरत की दुआ मांगते हैं. साथ ही, ज़रूरतमंदों की मदद करना और दान-पुण्य करना भी इस रात की रवायत का हिस्सा है. मौलाना इफराहीम हुसैन के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति सच्चे दिल से इस रात अल्लाह के सामने झुकता है, तो उसकी तक़दीर के बंद दरवाजे खुल सकते हैं.About the AuthorRahul Goelराहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ेंLocation :Aligarh,Uttar PradeshFirst Published :January 18, 2026, 09:26 ISThomedharmइस्लाम में इस रात को लिखी जाती है जिंदगी और मौत? जानिए क्या होता है ऐसा

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