नई दिल्ली (Tripti Kalhans IAS Success Story). क्या कभी सोचा है कि क्लास की पिछली बेंच पर बैठने वाली साधारण सी लड़की एक दिन देश की सबसे कठिन परीक्षा पास कर सकती है? आपका जवाब शायद ना में होगा. लेकिन आईएएस तृप्ति कलहंस की कहानी आपकी सोच बदल सकती है. आईएएस तृप्ति कलहंस खुद को गर्व से ‘बैकबेंचर’ कहती हैं. उन्होंने साबित कर दिया कि स्कूल की रैंक जीवन की दिशा तय नहीं करती है. एक एवरेज छात्रा से देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा तक का उनका सफर फिल्मी कहानी से कम नहीं है.
अक्सर माना जाता है कि यूपीएससी सिर्फ ‘किताबी कीड़ों’ या स्कूल टॉपर्स के लिए है. लेकिन उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले की रहने वाली तृप्ति कलहंस ने इस मिथक को जड़ से उखाड़ फेंका. वह पढ़ाई में औसत थीं, लेकिन उनके इरादे फौलादी थे. उनके सफर की सबसे बड़ी चुनौती तब आई जब वे लगातार 4 बार यूपीएससी परीक्षा में फेल हुईं. पड़ोसियों के तानों और अपनी ही क्षमताओं पर उठते सवालों के बीच उस बैकबेंचर लड़की ने हार मानने के बजाय अपनी गलतियों को ही गुरु बना लिया. पढ़िए ‘एवरेज स्टूडेंट’ की जिद्दी कहानी.
बैकबेंचर का ठप्पा और UPSC का सपना
तृप्ति कलहंस कभी भी ‘पढ़ाकू’ बच्चों की श्रेणी में नहीं रहीं. स्कूल के दिनों में पिछली बेंच पर बैठकर मस्ती करना और औसत नंबर लाना उनकी पहचान थी. तृप्ति कलहंस ने फातिमा सीनियर सेकेंडरी स्कूल गोंडा से 12वीं पास की है. इसके बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के कमला नेहरू कॉलेज से बीकॉम की डिग्री हासिल की. आईएएस तृप्ति कलहंस का मानना है कि बैकबेंचर होने का एक फायदा यह है कि आपको गिरने का डर नहीं होता, सिर्फ ऊपर उठने की गुंजाइश होती है.
चार साल का सन्नाटा: जब दुनिया ने मान लिया ‘द एंड’
सफर शुरू हुआ तो संघर्ष की कहानी भी लंबी होती गई. तृप्ति कलहंस यूपीएससी परीक्षा के पहले प्रयास में फेल हुईं, फिर दूसरे, तीसरे और चौथे में भी. आलम यह था कि रिश्तेदारों ने पूछना बंद कर दिया था और दोस्तों ने ‘तैयारी’ को उनके जीवन का हिस्सा मान लिया था. तृप्ति कलहंस बताती हैं कि कई बार उन्हें खुद पर हंसी आती थी कि एक बैकबेंचर होकर उन्होंने इतना बड़ा जोखिम क्यों लिया. लेकिन हर हार के बाद वह मुस्कुराकर फिर खड़ी हो जातीं. उन्होंने तय किया था कि वह लौटेंगी तो ‘साहब’ बनकर ही, वरना नहीं.
रणनीति में ‘देसी’ तड़का: किताबों से ज्यादा खुद पर काम
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में चौथी असफलता के बाद तृप्ति कलहंस ने महसूस किया कि वह टॉपर्स की नकल कर रही थीं. इसलिए उन्होंने अपनी स्ट्रैटेजी बदल दी:
किताबी कीड़ा बनने से तौबा: उन्होंने 18-18 घंटे पढ़ने के बजाय क्वॉलिटी स्टडी पर ध्यान दिया.
बैकबेंचर वाली ‘स्मार्टनेस’: उन्होंने कठिन विषयों को रटने के बजाय उन्हें अपनी भाषा में कहानियों की तरह समझा.
सोशल मीडिया से दूरी: किताबों और तैयारी पर फोकस करने के लिए उन्होंने सोशल मीडिया का इस्तेमाल कम कर दिया.
यूपीएससी इंटरव्यू का मजेदार किस्सा
तृप्ति कलहंस के यूपीएससी इंटरव्यू के दौरान उनकी सादगी और ईमानदारी ने बोर्ड को प्रभावित किया. जब उनसे उनकी शैक्षिक पृष्ठभूमि के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी ‘एवरेज’ परफॉर्मेंस और संघर्षों को स्वीकार किया. बोर्ड को उनमें एक ऐसी अफसर दिखी जो किताबी ज्ञान से नहीं, बल्कि जमीनी अनुभवों और हार से तपकर आई थी. तृप्ति कलहंस यूपीएससी परीक्षा 2023 में 199 रैंक हासिल कर आईएएस अफसर बन गईं.
आज वह देश के युवाओं के लिए एक मिसाल हैं कि सफलता के लिए ‘गोल्ड मेडलिस्ट’ होना जरूरी नहीं, बस ‘जिद्दी’ बैकबेंचर होना ही काफी है.

