Uttar Pradesh

न चीनी, न मिलावट! हाथों से बनी गुड़ की इस मसालेदार बर्फी ने बाजार में मचाया धमाल, लाइन लगाकर खरीद रहे लोग

बाराबंकी: उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो मेहनत, हुनर और देसी स्वाद की मिसाल बन चुकी है. यहां एक साधारण किसान ने अपने घर से शुरू किया छोटा सा काम आज पूरे इलाके में पहचान बना चुका है. गुड़ से बनने वाली उनकी खास मसालेदार बर्फी अब सिर्फ स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं रही, बल्कि आसपास के जनपदों में भी इसकी मांग लगातार बढ़ रही है.

यह कहानी बाराबंकी जिले की रामसनेहीघाट तहसील क्षेत्र के भिटरिया गांव में रहने वाले किसान अमित कुमार से जुड़ी है. अमित कुमार ने करीब एक दशक पहले गुड़ बनाने का काम शुरू किया था. समय के साथ उन्होंने पारंपरिक गुड़ के काम में बदलाव किया और गुड़ से ही मसालेदार बर्फी बनाने की शुरुआत की. कुछ ही समय में यह बर्फी लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई.

स्वाद ऐसा कि लगती है लंबी लाइनअमित कुमार की दुकान पर मसालेदार गुड़ बर्फी खरीदने के लिए लोग घंटों इंतजार करते हैं. स्थानीय ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के इलाकों से भी लोग इस खास बर्फी को खरीदने पहुंचते हैं. स्वाद में अलग पहचान होने के कारण यह बर्फी तेजी से लोकप्रिय हुई है और सर्दियों के मौसम में इसकी मांग सबसे ज्यादा रहती है.

कैसे बनती है मसालेदार गुड़ बर्फीअमित कुमार बताते हैं कि यह बर्फी पूरी तरह शुद्ध देसी गुड़ से बनाई जाती है. इसमें तिल, सोंठ, अजवाइन, मूंगफली और बादाम मिलाकर मसाला गुड़ तैयार किया जाता है. सबसे पहले गन्ने की पिराई कर रस निकाला जाता है. इसके बाद रस को बड़े बर्तन में भट्टी पर गर्म किया जाता है. जब रस गुड़ का रूप ले लेता है, तब तय मात्रा में मेवा और मसाले मिलाकर बर्फी तैयार की जाती है.

सिर्फ ठंड में बनती है, 4 से 5 महीने रहती है बिक्री
यह मसालेदार गुड़ बर्फी सिर्फ ठंड के मौसम में बनाई जाती है. इसकी बिक्री करीब 4 से 5 महीनों तक होती है. बर्फी की पैकिंग 500 ग्राम और 1 किलो के डिब्बों में की जाती है. बाजार में यह बर्फी सामान्य गुड़ के मुकाबले तीन गुना दाम पर बिकती है, फिर भी इसकी मांग बनी रहती है.

सेहतमंद और बिना मिलावट की मिठाईइस मसालेदार बर्फी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें न कोई केमिकल होता है और न ही कोई मिलावट. शुद्ध देसी गुड़ और खास मसालों का मेल इसे स्वाद के साथ सेहतमंद भी बनाता है. यही वजह है कि लोग इसे पसंद कर रहे हैं. इसकी कीमत करीब 150 रुपए प्रति किलो रखी गई है.

अमित कुमार की यह पहल दिखाती है कि अगर परंपरागत काम में थोड़ा नया प्रयोग किया जाए, तो वही काम पहचान और आमदनी दोनों का मजबूत जरिया बन सकता है. बाराबंकी का यह किसान आज अपने हुनर और मेहनत के दम पर पूरे इलाके में मिसाल बन चुका है.

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